आधी सदी देखना भी तो
जादू जादू जैसा लगता...
एक सिनेमा जैसा_
जो सादे पर्दे पर शुरू हुआ था
नाम नहीं
ना चेहरा मोहरा
ना कोई आवाज़
ना हरक़त
सिर्फ़ अंधेरा
सिर्फ़ उजाला
और अचानक कितने चेहरे
कितनी बातें
नाम,सदाएं
सब से पर्दा भर भर जाता!
इतने भरे भरे पर्दे में
पूरी आधी सदी बिताना
कम होता है?
पूरी आधी सदी बिताना जादू सा है
जादू ही तो
आख़िर ये जीवन होता है!!
-ओमा अक्क
(२१ अगस्त २०२६... एक पूरी सदी के आधे सफ़र पर अपना ही जन्मदिन मनाते हुए एक छोटी सी नज़्म.. बस!)
