स्टार न्यूज़ एजेंसी
''हमारी परिकल्पना है कि भारत के आर्थिक विकास में ऊर्जा का अधिक उपयोग न हो। अगले कुछ वर्षों में, हमें जीवाश्म ईंधन पर आधारित आर्थिक गतिविधि को धीरे-धीरे गैर-जीवाश्म ईंधन पर आधारित विकास की ओर ले जाना होगा और गैर-नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर ले जाना होगा। इस रणनीति में, सूर्य की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण् है और ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि वह वस्तुत: सभी ऊर्जा स्रोतों का मौलिक स्रोत है। हम अपने वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रबंधकीय प्रतिभाओं और पर्याप्त वित्तीय संसाधन को एक साथ जुटाकर हमारी अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने और हमारे देश के लोगों के जीवन में बदलाव लाने के लिए ऊर्जा के प्रचुर स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा का विकास करेंगे। इस प्रयास में हमारी सफलता भारत का चेहरा ही बदल देगी। यह दुनिया भर के लोगों की नियति को भी बदलने में भारत की सहायता करेगा। ''
- प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह (30 जून, 2008 को जलवायु परिवर्तन पर भारत की रणनीति को प्रस्तुत करते हुए)
जैसा कि जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना में भी कहा गया है, भारत एक ऊष्णकटिबंधीय (गर्म) देश है, जहां सूर्य का प्रकाश प्रतिदिन अधिक समय तक और ज्यादा तीव्रता के साथ उपलब्ध रहता है। अत: सौर ऊर्जा की भावी ऊर्जा स्रोत के रूप में व्यापक संभावनायें हैं। इसमें ऊर्जा के विकेन्द्रीकृत वितरण का अतिरिक्त लाभ भी है, जिससे जमीनी स्तर पर लोगों को सशक्त बनाया जा सके।
इसी परिकल्पना पर आधारित, राष्ट्रीय सौर मिशन को सोलर इंडिया के ब्राँड नाम के तहत शुरू किया जा रहा है। इस निर्णय की घोषणा करते हुए केन्द्रीय नवीन और नवीकरणीय (अक्षय) ऊर्जा मंत्री डॉ. फारूख अब्दुल्ला ने कहा था- यह यूपीए सरकार की एक ऐतिहासिक और युगान्तरकारी पहल है और मुझे गर्व है कि इसके क्रियान्वयन की देखरेख का काम मुझे सौंपा गया है। सोलर मिशन पंडित नेहरू की आधुनिक भारत की परिकल्पना के अनुसार ही है, जिसने आज भारत को एक अग्रणी परमाणु और अंतरिक्ष शक्ति बनाया है।
सौर ऊर्जा भारत के लिए महत्त्वपूर्ण और प्रासांगिक क्यों है?
लागत- कोयला जैसे बिजली के अन्य स्रोतों की तुलना में पूर्ण लागत के मामले में फिलहाल सौर ऊर्जा की लागत अधिक है। सौर मिशन का उद्देश्य क्षमता में तीव्रगति से विस्तार और प्रौद्योगिकीय नवाचार से लागत में कमी लाकर उसे ग्रिड के स्तर पर लाना है। मिशन को आशा है कि 2022 तक ग्रिड समानता हासिल हो जाएगी और कोयला आधारित ताप बिजली से 2030 तक समान स्तर पर लाया जा सकेगा। परन्तु इसमें यह बात स्वीकार की गई है कि लागत में यह कमी वैश्विक निवेश और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के स्तर पर निर्भर करेगी। लागत के बारे में जो अनुमान लगाये गए हैं वे अलग-अलग हैं। हर बार क्षमता को दोगुना बढाए जाने पर 22 प्रतिशत से लेकर वैश्विक निवेश को मौजूदा स्तर से 16 गुना बढाने पर केवल 60 प्रतिशत की कमी होने का अनुमान लगाया गया है। मिशन इस बात को स्वीकार करता है कि ग्रिड से परे भी सौर ऊर्जा के उपयोग हैं। ग्रामीण ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले ये उपयोग काफी किफायती हैं और उनके तेजी से विस्तार किए जाने की आवश्यकता है।
स्कैलेबिलिटी (व्यापकता)
भारत में सौर ऊर्जा की प्रचुर संभावनायें हैं। प्रतिवर्ष करीब 5000 ट्रिलियन (1 ट्रिलियन/ 10 खरब) के.डब्ल्यूएच (किलोवाट प्रति घंटा) ऊर्जा पड़ती भारत के भू-क्षेत्र में हैं और अधिकांश भागों में 4-7 कि.वाट घंटे प्रति वर्ग कि.मी. प्रतिदिन क्षमता की सूर्यकिरणें भारत की धरती को छूती हैं। अतएव सौर विकिरण को ताप और विद्युत यानी सौर तापीय और सौर फोटो- वोल्टिक, दोनों में परिवर्तित करने की प्रौद्योगिकी को भारत में बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा को नियंत्रित करने में स्तेमाल किया जा सकता है। सौर शक्ति वितरित आधार पर विद्युत पैदा करने की क्षमता प्रदान करती है और क्षमता को तेजी से बढ़ाने में मदद करती है। ग्रिड से परे विकेन्द्रीकृत और कम तापमान पर सौर ऊर्जा का उपयोग, ग्रामीण विद्युतीकरण के नजरिये से लाभदायक हो सकता है। विद्युत की अन्य आवश्यकताओं और ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में गर्म और ठंडा करने के काम में यह लाभदायक होगा। इसकी व्यापकता अथवा फैलाव (स्कैलेबिलिटी) पर जो दबाव है, वह स्थान की उपलब्धता को लेकर है, क्योंकि सभी मौजूदा उपयोगों में सौर शक्ति के दोहन में ज्यादा स्थान की जरूरत होती है। इसके अतिरिक्त, प्रभावी भंडारण के बगैर, सौर शक्ति में काफी विचलन की संभावना रहती है। भारत में यह बात, विशेषकर वर्षा त्रऽतु में अधिक सही साबित होती है।
पर्यावरणीय प्रभाव
सौर ऊर्जा पर्यावरण के अनुकूल और पर्या-हितैषी है, क्योंकि विद्युत अथवा ताप के उत्पादन में इससे कोई उत्सर्जन नहीं होता।
स्रोत की सुरक्षा
ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से सौर सभी स्रोतों में सबसे सुरक्षित स्रोत है। यह प्रचुरता में उपलब्ध है। सैध्दांतिक दृष्टि से, कुल आपतित सौर ऊर्जा को छोटा सा अंश भी (यदि प्रभावी ढंग से उसे कब्जे में किया जा सके) समूचे देश की ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। यह भी स्पष्ट है कि देश की गरीब और ऊर्जा से वंचित आबादी की भारी संख्या को देखते हुए ऊर्जा के अपेक्षाकृत प्रचुर संसाधनों का देश हित में यथासंभव दोहन किया जाना चाहिए। यद्यपि, आज की स्थित में, कोयला आधारित विद्युत उत्पादन, बिजली का सबसे सस्ता स्रोत है, भविष्य का परिदृश्य बताता है कि यह स्थिति बदल सकती है। बिजली की भारी कमी के कारण, देश के अन्दर बिजली की दर सामान्यत: सात रुपए प्रति यूनिट तक पहुंच चुकी है और पीक आवर्स (सर्वाधिक मांग के घंटों में) तो यह 8.50 रुपए प्रति यूनिट तक पहुंच जाती है। यह स्थिति भी बदल सकती है, क्योंकि, ऊर्जा की मांग में वृध्दि के कारण देश अब आयातित कोयले की ओर बढ रहा है। बिजली की कीमत, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कोयले की उपलब्धता और आयात संबंधी संरचना के विकास की लागत पर भी निर्भर करेगी। यह भी स्पष्ट है कि पर्यावरणीय क्षरण की लागत कोयले के खनन को भी प्रभावित करती है और ऐसा होना भी चाहिए, इस कच्चे माल के मूल्य में वृध्दि होगी। ऊर्जा के अभाव के कारण देश में डीजल आधारित विद्युत का उपयोग बढ रहा है, जो कि महंगी- कीमत 15 रुपए प्रति यूनिट तक, भी है और प्रदूषणकारी भी। इस परिस्थिति में, सौर ऊर्जा का उपयोग आवश्यक भी है और व्यवहारिक रूप से संभव भी। देश की चिरकाल से चली आ रही ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग बेहद जरूरी है।
उद्देश्य और लक्ष्य
राष्ट्रीय सौर मिशन का उद्देश्य देशभर में इसे यथाशीघ्र प्रसारित करने की नीति और स्थितियों का निर्माण कर भारत को विश्व में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में विश्व में शीर्ष स्थान पर बिठाना है। मिशन तीन चरणों का दृष्टिकोण अपनाएगा। 11वीं योजना की शेष अवधि और 12वीं योजना के पहले वर्ष (2012-13) को मिलाकर पहला चरण होगा, 12वीं योजना के शेष चार वर्ष (2013-17) दूसरा चरण, और 13वीं योजना (2017-22) तीसरा चरण होगा। प्रत्येक योजना के अंत में और 12वीं तथा 13वीं योजना के मध्य में प्रगति का मूल्यांकन होगा, आगे के चरणों के लिए क्षमता और मूल्यों की समीक्षा की जाएगी, जो कि घरेलू और वैश्विक, दोनों ही की, प्रौद्योगिक प्रवृत्तियों और उभरती लागत पर आधारित होगी। लक्ष्य यह रहेगा कि यदि आशा के अनुरूप लागत में कमी नहीं आती, या फिर आशा से अधिक तेजी आती है तो, सरकार को सब्सिडी (राज सहायता) की विवशता से बचाया जाए।
मिशन का तात्कालिक लक्ष्य, देश में, केन्द्रीकृत और विकेन्द्रीकृत दोनों ही स्तर पर, सौर प्रौद्योगिकी के विस्तार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना है। पहले चरण (2013 तक) में सौर ताप में लो हैंगिंग विकल्प को हासिल करने पर जोर देना है, वाणिज्यिक ऊर्जा से वंचित लोगों तक पहुंचाने के लिए ऑफ ग्रिड प्रणाली को बढावा देना और ग्रिड-आधारित प्रणाली की क्षमता में यथासंभव योगदान देना है। दूसरे चरण में, पिछले वर्षों के अनुभव का लाभ उठाते हुए क्षमता का विस्तार इस प्रकार करने का प्रयास किया जाएगा कि सौर ऊर्जा की पैठ प्रतिस्पर्धा दरों पर देशभर में हो सके।
हम सौर भारत के लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
2022 तक 20,000 मेगावाट सौ ऊर्जा के उत्पादन के लिए अनुकूल नीतिगत ढांचा तैयार करना
2013 तक यानी अगले तीन वर्षों में, ग्रिड से जुड़े सौर ऊर्जा उत्पादन को 1000 मेगावाट तक बढाना, जिन संस्थाओं को शुल्क के मामले में सरकार की ओर से रियायतें दी जाती हैं, उनके लिए नवीकरणीय ऊर्जा के क्रय को आवश्यक बनाकर 2017 तक 3000 मेगावाट की अतिरिक्त क्षमता बढ़ाना। यह क्षमता दोगुनी की जा सकती है।
आशा के अनुकूलन अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय निवेश और तकनीकी हस्तांतरण के बल पर यह क्षमता 2017 तक 10,000 मेगावाट से भी अधिक बढ़ाई जा सकती है। वर्ष 2022 तक 20,000 मेगावाट या उससे अधिक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य, पहले दो चरणों से प्राप्त अनुभवों पर निर्भर करेगा। उनके सफल होने पर ग्रिड-प्रतिस्पधा सौर ऊर्जा की संभावना बढ़ सकती है। अन्तर्राष्ट्रीय निवेश और प्रौद्योगिकी की उपलब्धता के आधार पर इस संक्रमण (बदलाव) को उपयुक्त रूप से बढ़ाया भी जा सकता है।
ऑफ ग्रिड उपयोगों के लिए कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना- 2017 तक 1000 मेगावाट और 2022 तक 2000 मेगावाट का उत्पादन।
2017 तक डेढ़ करोड़ वर्ग मीटर और 2022 तक दो करोड़ वर्गमीटर सौर तापीय संग्राहक क्षेत्र की स्थापना करना।
2022 तक ग्रामीण क्षेत्रों में दो करोड़ सौर प्रकाशीय प्रणालियां लगाना।
सनातन काल से हमारे देश में सूर्य की पूजा उत्तम स्वास्थ्य के स्रोत के रूप में होती रही है। राष्ट्र को ऊर्जावान बनाने के लिए एक बार फिर हम सूर्य में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।