अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे
मर गये पर न लगा जी तो किधर जाएंगे
सामने-चश्मे-गुहरबार के, कह दो, दरिया
चढ़ के अगर आये तो नज़रों से उतर जाएंगे
ख़ाली ऐ चारागरों होंगे बहुत मरहमदान
पर मेरे ज़ख्म नहीं ऐसे कि भर जाएंगे
पहुंचेंगे रहगुज़रे-यार तलक हम क्यूंकर
पहले जब तक न दो-आलम से गुज़र जाएंगे
आग दोजख़ की भी हो आएगी पानी-पानी
जब ये आसी अरक़े-शर्म से तर जाएंगे
हम नहीं वह जो करें ख़ून का दावा तुझपर
बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएंगे
रुख़े-रौशन से नक़ाब अपने उलट देखो तुम
मेहरो-मह नज़रों से यारों के उतर जाएंगे
'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उनको मैख़ाने में ले लाओ, संवर जाएंगे
-ज़ौक़
नजूमी...
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कुछ अरसे पहले की बात है... हमें एक नजूमी मिला, जिसकी बातों में सहर था...
उसके बात करने का अंदाज़ बहुत दिलकश था... कुछ ऐसा कि कोई परेशान हाल शख़्स उससे
बा...
