जगदीश्‍वर चतुर्वेदी
ग्लोबलाइजेशन के मीडिया तंत्र और विचारधारा की प्रतीकात्मक धुरी है ब्रॉण्ड। नॉमी क्लीन ने ”नो लोगो : लुकिंग एम एट दि ब्रॉण्ड बुलिस” (2000) में विस्तार से इस पहलू पर विचार किया है। नॉमी ने लिखा है ग्लोबलाइजेशन का युग ब्रॉण्ड का युग है।आप चारों ओर लोगोज देखते हैं। यहां तक कि आपकी निजी जीवन की अवस्था में भी लोगोज देखते रहते हैं। सार्वजनिक स्थानों से लेकर व्यक्तिगत बाथरुम तक सभी जगह लोगोज का साम्राज्य है। यह ऐसी दुनिया है जिसे ब्रॉण्ड दुनिया कह सकते हैं। यह हमारी अभिरुचि, सांस्कृतिक स्टैण्डर्ड और व्यक्तिवादिता परिभाषित कर रहे हैं।

ब्रॉण्ड संस्कृति का नारा है ” जस्ट डू इट”। ब्रॉण्ड के युग में प्रोडयूसर और प्रोडक्ट के बीच नए किस्म का संबंध बनते हैं। ब्रॉण्ड मूलत: एक गुणवत्तापूर्ण माल की गारंटी है। ब्रॉण्ड अपने को मूल प्रोडक्ट से पृथक कर लेता है और बिक्री की वस्तु बन जाता है। नॉमी की राय है कि अनेक बहुराष्ट्रीय ब्रॉण्ड नाम रूपान्तरण की प्रक्रिया में हैं, वे भूमंडलीय ब्राँण्ड के रुप में पहचान बना रहे हैं, ब्राँण्ड में गंभीर आंतरिक अर्थ सपने की तरह पेश करते हैं।वे क्यों व्यक्तिवादिता, खेलकूद की भावना ,अलमस्त भाव अथवा सामुदायिक स्प्रिट पेश करते हैं? यही वह बिंदु है जिसके आधार पर वस्तु के ऊपर विचार को पेश किया जाता हैं, मार्केटिंग विभाग के पास ब्राँण्ड की पहचान बनाने का जिम्मा होता है और वे उस वस्तु को देखते हैं जिसके साथ प्रतिस्पर्धा है, हम ‘जानते हैं कि माल फैक्ट्री में तैयार होता है।” जैसाकि वाल्टर लेण्डर, प्रेसीडेण्ट लेण्डर ब्रॉण्डिंग एजेंसी, ने कहा कि ”किंतु ब्रॉण्ड मन में तैयार किया जाता है।” जे.वाल्टर थामसन एजेंसी के प्रेसीडेंट पीटर शुटजर ने कहा ” प्रोडक्ट और ब्रॉण्ड में बुनियादी फर्क है, प्रोडक्ट वह है जो फैक्ट्री में तैयार होता है, ब्रॉण्ड वह है जो उपभोक्ता को पेश किया जाता है।” ब्रॉण्ड में विचार,जीवनशैली,एटीट्यूट आदि मूल्यों को शामिल किया जाता है, ब्रॉण्ड निर्माता ही तथाकथित ज्ञान अर्थव्यवस्था के प्रस्तोता हैं। ब्राँण्ड की खूबी है कि वह जिस वस्तु के साथ जुड़ा होता है उससे अलग अस्तित्व के अन्य क्षेत्रों में स्वयं ही सक्रिय हो जाता है। मसलन् नीकी ब्राँण्ड को ही लें,वह आरंभ में उच्च तकनीकी का स्नीकर हुआ करता था,अमेरिका में साठ और सातवें के दशक में जॉगिंग का जोर था, जब आठवें दशक में जॉगिंग का उन्माद ठंडा पड़ गया तब उस समय रीवुक ने नीकी को जीवनशैली के रुप में पेश किया। उसे ”एसेंस ऑफ एथलेटिसिज्म’ के रुप में पेश किया। इसके लिए नीकी ने अनेक नामी खिलाडियों को मॉडल के रुप में उतारा।बाद में नीकी को ब्रॉण्ड के रुप में ट्रैकसूट, टी-शर्ट, बाथिंग सूट,मोजा,आदि के साथ पेश किया। आज वह सिर्फ जूता ही नहीं है,बल्कि उसने अन्य वस्तुओं में भी अपना प्रसार कर लिया है। ब्राँण्ड सिर्फ एक वस्तु तक सीमित नहीं रहता बल्कि अस्तित्व की अन्य वस्तुओं में अपना प्रसार कर लेता है। यही बात अन्य ब्राँण्ड पर भी लागू होती है। सफल ब्राँण्ड की विशेषता है कि वह ‘सिनर्जी’ अथवा सहक्रिया पैदा करता है।वही उसके मुनाफे का स्रोत है। उद्योग में वर्चस्व ही सब कुछ नहीं होता, ब्राँण्ड के लिए है कि वह अन्य क्षेत्र में भी प्रसार करे। मसलन् खेल से मनोरंजन अथवा स्कूल से संस्कृति की ओर प्रसार करे।

ब्राँण्ड का लक्ष्य होता है उपभोक्ता की इच्छाओं के साथ एकीकृत करना।उपभोक्ता की इच्छाओं को ब्राँण्ड में उतारना। जब ब्राँण्ड में जीवनशैली को आरोपित कर दिया जाता है तो फिर वह ग्राहक को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करता है कि तुम सारी जिन्दगी इसमें रह सकते हो। अब जंग वस्तुओं के बीच में नहीं बल्कि ब्राँण्डों के बीच शुरू हो जाती है। वह निरंतर अपनी सीमाओं को निर्मित और पुनर्निमित करते रहते हैं।वे अपनी सीमाओं का विस्तार करते हैं और ज्यादा से ज्यादा जीवनशैली अपने में समाहित करने की कोशिश करते हैं। अब जंग वस्तु को बेचनेके लिए नहीं बल्कि जीवनशैली को बेचने के लिए होने लगती है। इस जंग का सामाजिक आधार है युवावर्ग। मसलन् नीकी ब्रॉण्ड ने ‘कूल’ और ‘कूल’ पर बहुत जोर दिया,इसकी बाद में खोज की गई कि आखिरकार ‘कूल’ पर इतना जोर क्यों? टॉमी हेलीफिगर ने उद्धाटित किया कि काले लोगों की बस्तियों में जाकर उसका रहस्य छिपा है। अमरीका के काले गरीब युवाओं में जो जो जीवनशैली प्रचलन में थी उसे गोरे युवाओं के बाजार में लाकर खड़ा कर दिया गया। इसके लिए जो विज्ञापन तैयार किए गए उनमें परजीवी जीवन संबंधों को केन्द्र में रखा गया। नीको के ब्राँण्ड ने युवाओं के अलगरव और बागी सांस्कृतिक रुपों को अभिव्यक्ति दी,ये वे युवा थे जो पंक संस्कृति, हिप-हॉप संस्कृति आदि से आते थे। यही स्थिति उन्होंने स्त्रीवाद, समलैंगिक मुक्ति और बहुसांस्कृतिकवाद के संदर्भ में भी की। ये सारी थीम प्रतिष्ठान विरोधी, सत्ता विरोधी थीं और यही वह बुनियादी वजह है कि नीकी ब्राँण्ड हिट कर गया।

किसी माल का मार्केटिंग के दौरान ब्राँण्ड में रुपान्तरण सामयिक पूंजीवाद की गुलामी के फिनोमिना की आदर्श अभिव्यक्ति है। इसमें सारा उत्पादन कांट्रेक्ट पर होता है,इसी में मेगा ब्राँण्ड की नई चीजें जन्म लेती हैं, इससे जहां एक ओर लागत में बचत होती है वहीं दूसरी ओर ब्रॉण्ड को मार्केटिंग के जरिए उतारने में सहूलियत होती है। यहां एक एशियाई एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन से माल दूसरे प्रोसेसिंग जोन में भेजा जाता है। मसलन् नीकी को ही ले, उसका ताइवान से कोरिया के प्रोसेसिंग जोन में स्थानान्तरण किया जाता है। इसी क्रम में हमें यह भी पता चलता है कि आखिरकार ब्राँण्ड किस तरह की श्रम-संस्कृति को पैदा कर रहे हैं। ब्राँण्ड के लिए काम करने वालों को यूनियन बनाने का अधिकार नहीं है, इन्हें श्रम की पगार कम दी जाती है, हमेशा अस्थायी कर्मचारी के रुप में काम करना होता है, खासकर एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोनप में औरतें अस्थायी रुप में काम करती हैं।यह स्थिति फिलीपींस में नीको के कारखानों में दर्ज की गई। यही वह बिंदु है जहां विकासशील देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का हमारा भ्रम टूटता है। युवा लोगों की वास्तव जिंदगी देखकर ग्लोबलाइजेशन की बर्बरता के प्रति घृणा पैदा होती है, इन इलाकों में जो युवा मजदूर काम कर रहे हैं उनके हालात कैदी जैसे हैं। वे जो पगार पाते हैं वह उनके श्रम की बदले जितनी मिलनी चाहिए उसकी तुलना में बहुत कम होती है।अधिकतर मजदूरों की पगार का बड़ा हिस्सा कमरे ,परिवहन, और बुनियादी खर्चों पर ही व्यय हो जाता है।वियतनाम और चीन के सरकारी अधिकारी इस बात को लेकर हमेशा परेशान रहते हैं कि कहीं निवेशक भाग न जाए,इसलिए निवेशकों के लिए वे सभी किस्म के करों में छूट देते हैं,साथ ही मजदूरों को यूनियन नहीं बनाने देते। हमारे यहां भी ग्लोबलाइजेशन के नाम पर आईटी क्षेत्र से लेकर एसईजेड तक यही सरकारी प्रस्ताव है। इन इलाकों में कोई यूनियन नहीं होगी। जब भी मजदूरों के शोषण का सवाल सामने आता है तो ये कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से हाथ झाड़ लेती हैं। वह ठेकेदार पर जिम्मेदारी डाल देती हैं,सब-कांट्रेक्टर पर जिम्मेदारी डाल देती हैं।वे कहती हैं कि यह विवाद मजदूरों और सब-कांट्रेक्टर के बीच का है,उनका इससे कोई लेना-देना नहीं है। मजदूरों ने जब नीकी, रीवुक, आदिदास आदि कंपनियों के कारखानों में मजदूरों के शोषण,कम पगार और श्रम की भयावी अवस्था के सवाल उठाए तो यही बात कही गयी। इन सभी कंपनियों की रणनीति यह होती है कि इनके यहां कोई स्थायी कर्मचारी नहीं होता,वे उन्हें कम से कम पगार देते हैं, हमेशा अंशकालिक कर्मचारी के रुप में रखते हैं, साथ उन्हें किसी अन्य एजेंसी के जरिए अथवा अन्य के नाम पर नौकरी देते हैं। पहले जो काम किसी कंपनी के स्थायी कर्मचारी किया करते थे अब वही काम ठेका पर काम करने वाली एजेंसियों के मजदूर करते हैं। ऐसी स्थिति में कंपनी के पास संपूर्ण मानव संसाधन तो होते हैं किंतु उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं होती। अब कंपनी मालिकों का नया मजदूर मंत्र है ” तुम मूर्ख हो यदि उनके मालिक हो।” पहले कंपनी मजदूरों की मालिक कहलाना पसंद करती थीं अब मालिक कहलाने वाले मूर्ख कहे जाते हैं। इस समूची प्रक्रिया का परिणाम यह निकला है कि कारपोरेट घरानों की सामाजिक बढत स्थापित हुई है। मजदूर हाशिए पर पहुँच गया है, उसके अब तक के अर्जित अधिकार भी दांव पर लग चुके हैं। उसकी सारी उपलब्धियों के सामने खतरा खड़ा हो गया है।


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