मनीष देसाई
पिछले कई दशकों में टाटा औद्योगिक समूह ने देश में न्‍यासों की स्‍थापना की है जिनके जरिए इंडियन इंस्‍टीटयूट आफ साइंस और टाटा इंस्‍टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च जैसे संस्‍थान बने। विप्रो कंपनी के अध्‍यक्ष अजीम प्रेमजी ने देश में स्‍कूली शिक्षा की दशा सुधारने के लिए करीब दस हजार करोड़ रुपए दान में दिए हैं। इन्‍फोसिस कंपनी ने भी हर साल सामाजिक कार्यों के लिए इन्‍फोसिस फाउंडेशन के जरिए अपने लाभ‍का एक प्रतिशत देने की प्रतिबद्धता जतायी है। इसके अलावा अन्‍य औद्योगिक घरानों जैसे बिड़ला, महिन्‍द्रा, कल्‍याणी ने भी अपने लाभ का कुछ हिस्‍सा समाज के हित के लिए देने की बात कही है।
इन उदाहरणों से एक बात तो स्‍पष्‍ट है कि भले ही कम संख्‍या में हों लेकिन देश में ऐसी कंपनियां अवश्‍य हैं जो अपनी सामाजिक जिम्‍मेदारी या सीएसआर का निर्वहन करती हैं। ये कंपनियां जहां स्‍थित हैं वहां के समुदाय के विकास कार्यो में संलग्‍न हैं। टाटा कंपनी ने ऐसा ही उदाहरण पेश करते हुए जमशेदपुर में अपने कर्मचारियों और उनके परिवार के सदस्‍यों के लिए शिक्षा एवं पूर्ण स्‍वास्‍थ्‍य की दिशा में काफी काम किया है।

इस सबके बावजूद भारतीय माहौल में सीएसआर को बहुत कम तरजीह दी जाती है। अगर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम की नवरत्‍न एवं मिनीरत्‍न कंपनियों और प्रसिद्ध बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों तथा मुठ्ठी भर भारतीय कंपनियों को छोड़ दिया जाये तो अन्‍य कंपनियों में सीएसआर को लेकर एक भ्रम बना हुआ है। सामान्‍य रूप से इसे धर्मदान ही कहा जाता है। सामान्‍य रूप से कहें तो सीएसआर को कंपनियां खुद के लिए बोझ समझती हैं न कि उनके व्‍यापार का हिस्‍सा, इसलिए ही उनका रवैया संरक्षण परक और महज चेक बुक तक ही सिमटा हुआ है।
लेकिन अब इसमें परिवर्तन आ रहा है। सीएसआर समाज के लिए कुछ बेहतर करने और एक आवश्यक व्‍यापारिक कार्य के तौर पर उभरा है। सरकार ने इस दिशा में श्री यशवंत सिन्‍हा की अध्‍यक्षता में गठित संसद की स्‍थाई समिति की सिफारिशें मंजूर की हैं। समिति की अनुशंसा है कि एक हजार करोड़ से अधिक टर्नओवर वाली कंपनियां या ऐसी कंपनियां जिनका लाभ सालाना पाँच करोड़ रूपए से अधिक है, वे अपने लाभ का दो प्रतिशत हिस्‍सा सीएसआर में देंगी ।
केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों के लिए सीएसआर सम्‍बंधी जो दिशानिर्देश जारी किए गए हैं उनमें स्‍पष्‍ट कहा गया है कि औद्यगिक क्षेत्र की सामाजिक  जिम्‍मेदारी धर्मदान से कहीं आगे जाती है और इसका विस्‍तार सामाजिक और व्‍यापारिक लक्ष्यों का एकीकरण तक है। सीएसआर को इस प्रकार देखा जाना चाहिए कि जिससे एक लंबे समय में सतत प्रतिस्‍पर्धी लाभों को हासिल किया जा सके।
हालांकि कई कंपनियों और औद्योगिक घरानों ने इस बात की जीतोड़ कोशिश की है कि सीएसआर को अनिवार्य न किया जाये। जो लोग इस प्रस्‍ताव का विरोध कर रहे हैं उनका तर्क है कि सीएसआर का विचार स्‍वत: दान देने का है और सरकार को इसे कंपनियों पर जबरन नहीं थोपना चाहिए। उनके अनुसार वास्‍तव में यह कंपनियों के लाभ पर एक नए स्‍वरूप का कर ही है।
सीएसआर के समर्थकों के अनुसार यह एक संकुचित दृष्टिकोण है। कंपनियां जिस परिवेश में काम करतीं हैं उसमें बहुत परिवर्तन आ गया है। एक कंपनी बिना सामुदायिक मदद के ठीक से काम नहीं कर सकती है। पिछड़े लोगों व क्षेत्र के लिए कार्यरत सरकारी संगठनों या एनजीओ के उभरने से हालात बदले हैं। साथ ही केंद्र और राज्‍य सरकारें विकास की रणनीति के तहत समग्र वृद्धि को महत्‍व देने लगीं हैं। इतना ही नहीं उपभोक्ता, आम लोग और निवशेक यही उम्‍मीद करते हैं कि कंपनियां जिम्‍मेदारी के साथ साथ सतत विकास की दिशा में काम करेंगी । इस प्रकार से सीआरएस विभिन्‍न सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक दबावों के परिणाम के तौर पर उभरा रहा है ।
सीएसआर का मूल विचार
सीएसआर का मूल विचार वर्ष 1953 में उस समय सामने आया जब एक व्‍यापारी विलियम जे बोवेन ने सामाजिक जिम्‍मेदारी के बारे में अपने विचार जाहिर किए। लेकिन सीएसआर को प्रसिद्धि वर्ष 1990 में ही मिली। हालांकि इसकी शब्‍दावली अभी भी बहुत स्‍पष्‍ट तौर पर सामने नहीं आयी है और इसके अनुप्रयोगों पर एकमतता भी नहीं हैं।
वैश्‍विक तौर पर सीएसआर का विचार सामुदायिक विकास के रूप में ज्‍यादा ग्रहण किया जा रहा है। इसके तहत औद्योगिक घराने खुद की  क्षमता के विकास के लिए सामुदायिक विकास का काम करते हैं। हालांकि कंपनियां अभी भी धर्मदान को सीएसआर की तुलना में महत्‍व दे रही हैं पर इसकी अब आलोचना भी की जा रही है। इसकी वजह यह है कि धर्मदान करने से संबंधित संस्‍था पूरी तरह दाता पर ही निर्भर हो जाती है और आगे चलकर उसकी दक्षता में कमी आती है।
भारत में सीएसआर का विस्‍तार
भारत में कई अग्रणी औद्योगिक घराने पहले से ही शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, जीविकोपार्जन निर्माण, दक्षता विकास और समाज के कमजोर वर्गों के उत्‍थान में लगे हुए हैं। जून 2009 में 300 व्‍यापारिक घरानों पर हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार सीएसआर की गतिविधियां 20 राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैली हुई हैं। सीएसआर का सर्वाधिक लाभ महाराष्‍ट्र को मिल रहा है। आंकडों के अनुसार  सीएसआर गतिविधियों के कुल दान में से 36 प्रतिशत इस राज्‍य में संक्रेदित है तथा गुजरात इस सूची में दूसरे नम्‍बर पर है। पश्‍चिमी भारत में बसे इस राज्‍य की सीएसआर में हिस्‍सेदारी 12 फीसदी की है जबकि दिल्‍ली 10 प्रतिशत और तमिलनाडु नौ प्रतिशत के साथ क्रमश: तीसरे और चौथे पायदान पर हैं। ये कंपनियां सीएसआर के तहत समग्र तौर पर कुल 26 क्षेत्रों में काम कर रहीं हैं। इनमें पहले स्‍थान पर सायुदयिक कल्‍याण है और इसके बाद शिक्षा, पर्यावरण, स्‍वास्‍थ्‍य और ग्रामीण विकास का नम्‍बर आता है।
हालांकि यह चौंकाने वाली बात तो नहीं है लेकिन इस सर्वे से यह भी स्‍पष्‍ट हुआ है कि सीएसआर सम्‍बंधी गतिविधियां ज्‍यादातर वहीं केंद्रित हैं जहां पर वे कार्य करती हैं। दूसरे यह कि इस प्रवृत्‍ति के जारी रहने के भी संकेत हैं। इसका खराब पक्ष यह है कि सीएसआर से मिलने वाले लाभ उन्‍हीं राज्‍यों को मिल रहे हैं जो पहले से ही विकसित हैं न कि ऐसे राज्‍यों को जो विकास के निचले पायदान पर हैं और वे केंद्र सरकार की सहायता पर ही निर्भर हैं।
भारतीय कंपनियों की सीएसआर गतिविधियों पर हुए एक अन्‍य सर्वे में पाया गया कि कोई भी कंपनी इसमें उच्‍चतम स्‍तर हासिल नहीं कर सकी। इसके लिए सर्वे में शून्‍य से पाँच तक का एक विकसित पैमाना प्रयोग किया गया। कुल 500 कंपनियों में से केवल 16 प्रतिशत कंपनियों ने ही पूर्ण परिभाषित सीएसआर के अनुसार काम किया। इसका आशय यह हुआ कि शेष 84 प्रतिशत कंपनियों ने सीएसआर के इस विचार को अभी ग्रहण नहीं किया है। इसके अलावा समझ की कमी, अपर्याप्‍त प्रशिक्षित मानव श्रम, वास्‍तविक आंकड़ों की कमी, नीति और सीएसआर गतिविधियों की विशिष्‍ट जानकारी का अभाव भी इसके कार्यक्रमों और पहुंच को कठिन बना रहे हैं।
सरकार सीएसआर से जुड़ी पहलों को मजबूत बनाने की दिशा में एक ढांचे का निर्माण बनाने का प्रयत्‍न कर रही है। इस बात का भी प्रयास किया जा रहा है कि हरित पहल करने वाली कंपनियों को मिलने वाले कार्बन क्रेडिट की तर्ज पर ही सीएसआर अपनाने वाली कंपनियों को सीएसआर क्रेडिट दिया जा सके।
राष्‍ट्रीय सीएसआर केंद्र
देश में सीएसआर गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए मुंबई में बने टाटा इंस्‍टीट्यूट  आफ सोशल साइंस या टीआईएसएस में राष्‍ट्रीय सीएसआर केंद्र की स्‍थापना की गयी है। यह संस्‍थान औ़़द्योगिक घरानों की सामाजिक जिम्‍मेदारी की परियोजनाओं पर शोध तथा थिंक टैंक की तरह काम करता है। इस केंद्र को सार्वजनिक उपक्रम विभाग धन उपलब्‍ध कराता है। यह केंद्र राष्‍ट्रीय स्तर पर आंकड़ों का संग्रहण और दस्‍तावेजीकरण करता है और इसका उद्देश्‍य राष्‍ट्रीय विकास के लक्ष्‍यों के साथ एकीकरण करना है।
सीएसआर सम्‍बंधी नए दिशानिर्देशों का जोर हल्‍केपन से अपनाये गए तरीकों के बजाए परियोजना आधारित और जिम्‍मेदारी परक है। इस बात पर भी जोर दिया जा रहा है कि सामाजिक कल्‍याण की परियोजनाएं सर्वेक्षण पर आधारित हों और इसमें निगरानी और ठोस तरह से कार्यक्रम लागू किये जायें। इसमें यह भी कहा गया है कि सीएसआर कार्यक्रमों को कंपनियों के आम कर्मचारियों के बजाए विशेषज्ञ एंजेसियों के माध्‍यम से करवाया जाये। इन एजेंसियों में समुदाय आधारित संगठनों (एनजीओ), पंचायत संगठन, अकादमिक संस्‍थान, ट्रस्‍ट एवं मिशन, स्‍यवं सहायता समूह, महिला मंडल आदि शामिल हैं।
अमेरिका के नार्टे डेम विश्‍वविद्यालय में प्रोफेसर और सीएसआर विशेषज्ञ प्रोफेसर लियो बुर्के  के अनुसार भारत को इस मामले में राष्‍ट्रीय स्‍थानीय दृष्‍टिकोण अपनाना होगा ।
यह तर्क कि व्‍यापार का प्राथमिक काम लाभ कमाना और कर चुकाना है तथा यह केंद्र, राज्‍य स्‍थानीय निकायों की जिम्‍मेदारी है कि वह आवश्‍यक सामाजिक ढांचा बनाये, अभी तक प्रचलन में हैं। लेकिन एक उद्योग को स्‍वस्‍थ एवं शिक्षित कामगार चाहिये जिससे काम को दक्षता से अंजाम दिया जा सके । किसी भी समाज को उन्नति करने के लिए लाभप्रद और प्रतिस्‍पर्धी व्‍यापार को अवश्‍य ही बढ़ावा देना चाहिये  और आय एवं अवसरों को मजबूत बनाना चाहिए । इसे सृजनात्‍मक साझा मूल्‍य कहा गया है और यह कंपनियों और समाज के व्‍यापक हित में है । इससे ही सीएसआर का आधार विस्‍तृत होगा और कंपनियों की यह समझ बढ़ेगी कि उनके कामगारों के लिए क्या अच्‍छा है और उसके कर्मचारियों का स्‍वास्‍थ्‍य और पर्यावरण भी उनके व्‍यापर के लिए लाभदायक है ।


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