फ़िरदौस ख़ान
मौजूदा खाद्यान्न की जरूरत को देखते हुए देश में दूसरी हरित क्रांति पर खासा जोर दिया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि जब सोना उगलने वाली धरती ही बंजर हो जाएगी तो अनाज कैसे पैदा होगा। इसलिए भूमि की उर्वरक शक्ति को बचाए रखना बेहद जरूरी है, वरना कृषि के विकास की तमाम योजनाएं धरी रह जाएंगी।

गौरतलब है कि देश में हरित क्रांति की शुरुआत वर्ष 1966-67 में हुई थी। इसकी शुरुआत दो चरणों में की गई थी, पहला चरण 1966-67 से 1980-81 और दूसरा चरण 1980-81 से 1996-97 रहा। हरित क्रांति से अभिप्राय देश के सिंचित और असिंचित कृषि क्षेत्रों में ज्यादा उपज वाले संकर और बौने बीजों के इस्तेमाल के जरिये तेजी से कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी करना है। हरित क्रांति की विशेषताओं में अधिक उपज देने वाली किस्में, उन्नत बीज, रासायनिक खाद, गहन कृषि जिला कार्यक्रम, लघु सिंचाई, कृषि शिक्षा, पौध संरक्षण, फसल चक्र, भू-संरक्षण और ऋण आदि के लिए किसानों को बैंकों की सुविधाएं मुहैया कराना शामिल है। रबी, खरीफ और जायद की फसलों पर हरित क्रांति का अच्छा असर देखने को मिला। किसानों को थोड़े पैसे ज्यादा खर्च करने के बाद अच्छी आमदनी हासिल होने लगी।

हरित क्रांति के चलते हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडू के खेत सोना उगलने लगे। साठ के दशक में हरियाणा और पंजाब में गेहूं के उत्पादन में 40 से 50 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज की गई। जिस वक्त हरित क्रांति का नारा बुलंद हुआ उस वक्त देश भुखमरी के दौर से गुजर रहा था और देश को अनाज की सख्त जरूरत थी। इसलिए सभी का ध्यान ज्यादा से ज्यादा अनाज पैदा करने में था, लेकिन जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया रासायनिक उर्वरकों और अत्यधिक विषैले कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल की वजह से सोना उगलने वाली धरती बंजर होने लगी।

हरियाणा में उपजाऊ शक्ति के लगातार ह्रास से भूमि के बंजर होने की समस्या ने किसानों के सामने एक नई चुनौती पैदा कर दी है। सूखा, बाढ, लवणीयता, कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल और अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल स्तर में लगातार गिरावट आने से उपजाऊ धरती अब मरूस्थल का रूप धारण करती जा रही है। हरियाणा मृदा प्रयोगशाला की एक रिपोर्ट के मुताबिक 90 के दशक तक मिट्टी की उपजाऊ शक्ति सही थी, लेकिन उसके बाद मिट्टी से जिंक, आयरन और मैगनीज जैसे पोषक तत्वों की कमी होने लगी। राज्य के दस जिलों की मिट्टी का पीएच लेवल सामान्य स्तर पर नहीं है। अम्बाला, कुरुक्षेत्र, कैथल और करनाल जिलों में कृषि भूमि में जिंक की मात्रा तेजी से घट रही है, जबकि हिसार, जींद, फतेहाबाद और सिरसा जिले की कृषि भूमि में मैगनीज की कमी है। किसान रासायनिक खादों का इस्तेमाल कर इन पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं जिससे भूमि बंजर हो रही है। हरियाणा में एक साल के भीतर 291 हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर हो गई। इसमें अम्बाला की 12 हेक्टेयर, कुरुक्षेत्र की आठ हेक्टेयर, कैथल की 17 हेक्टेयर, पानीपत की 24 हेक्टेयर, सोनीपत की 16 हेक्टेयर, जींद की 19 हेक्टेयर, हिसार की 17 हेक्टेयर, फतेहाबाद की छह हेक्टेयर, सिरसा की भी छह हेक्टेयर, गुडग़ांव की 24 हेक्टेयर, रेवाडी क़ी 23 हेक्टेयर, महेंद्रगढ क़ी भी 23 हेक्टेयर, भिवानी की 28 हेक्टेयर, फरीदाबाद की 32 हेक्टेयर, पंचकूला की 12 हेक्टेयर और यमुनानगर की 20 हेक्टेयर शामिल है।

हैरत की बात यह भी है कि अधिक उत्पादन के लिए ज्यादा खाद का उत्पादन करने वाले राज्य अब पैदावार के मामले में पिछड रहे हैं। हरियाणा 327 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर खाद के इस्तेमाल पर सिर्फ 62 हजार रुपए की प्रति हेक्टेयर पैदावार दे रहा है। इंडिकस एनालिटिक्स के मुताबिक देश के सर्वाधिक उर्वरक इस्तेमाल करने वाले जिलों की फेहरिस्त में हरियाणा को सबसे ज्यादा जगह मिली है। हरियाणा के करनाल, पानीपत, सोनीपत और कुरुक्षेत्र जिले इस रैंकिंग में क्रमश: दूसरे, तीसरे, नौवें और दसवें नंबर पर हैं। करनाल और पानीपत में एक साल के दौरान खाद का इस्तेमाल 650 से 700 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पहुंच गया है, जबकि सोनीपत और कुरुक्षेत्र में भी खाद का इस्तेमाल 500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से ज्यादा है। करनाल और पानीपत की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता देश में क्रमश: 66वें और 130वें नंबर पर है। हरियाणा केंद्रीय पूल में पंजाब के बाद गेहूं देने वाला देश का दूसरा राज्य है, लेकिन पिछले लगातार कुछ सालों से यहां प्रति हेक्टेयर उत्पादन में कम दर्ज की गई है। जहां वर्ष 1999-2000 में राज्य में कुल 96.50 लाख टन का उत्पादन हुआ, वहीं वर्ष 2004-2005 में यह घटकर 88.57 लाख टन ही रह गया। इतना ही नहीं इस समयावधि में प्रति हेक्टेयर उत्पादन में बेहद कमी दर्ज की गई। जहां वर्ष 1999-2000 में गेहूं का उत्पादन औसत 41.43 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था, वहीं वर्ष 2005-2006 में यह घटकर 38.67 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रह गया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जहां 1901 में प्रति व्यक्ति 1.37 हेक्टेयर कृषि भूमि उपलब्ध थी, वह 1951 तक घटकर 0.98 हेक्टेयर रह गई है। मगर अब स्थिति और भी चिंताजनक है, क्योंकि 2001 में कृषि भूमि की यह उपलब्धता प्रति व्यक्ति मात्र 0.15 हेक्टेयर रह गई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर कृषि भूमि की उपलब्धता में आ रही इस गिरावट को नहीं रोका गया तो आने वाले समय में हमें खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ेगा।

इसके अलावा अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल स्तर में गिरावट आने से भी बंजर भूमि के क्षेत्र में बढ़ोतरी हो रही है। केंद्रीय भूमि जल प्राधिकरण के मुताबिक देशभर के 18 राज्यों के 286 जिलों में पिछले दो दशकों के दौरान भू-जल स्तर चार मीटर गिरा है। हरियाणा के महेंद्रगढ अौर कुरुक्षेत्र में भू-जल स्तर हर साल क्रमश: 54 और 48 सेंटीमीटर की गति से गिर रहा है। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक कुरुक्षेत्र, करनाल, गुडग़ांव, मेवात, पानीपत, कैथल, रेवाडी, यमुनानगर, पंचकूला, फरीदाबाद, सोनीपत और महेंद्रगढ ज़िलों में औसत भू-जल स्तर तेजी से गिर रहा है। काबिले-गौर है कि जमीन में पानी के रीचार्ज के मुकाबले टयूबवैल 40 से 50 फीसदी भू-जल का दोहन कर रहे हैं। हरियाणा स्टेट माइनर इरिगेशन टयूबवैल कॉरपोरेशन और सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1966 में 27,957 टयूबवैल थे, लेकिन वर्ष 2000 में इनकी संख्या बढ़कर 83,705 हो गई। मौजूदा वक्त में राज्य में करीब 6,11,603 बताई जा रही है। इनमें से 2,80000 टयूबवैल डीजल और तीन लाख टयूबवैल बिजली से चलाए जा रहे हैं। पर्यावरणविदों के मुताबिक भारत में भूमि प्रबंधन का परिदृश्य बेहद निराशाजनक है। आजादी के बाद सिंचाई के परंपरागत तरीकों के बजाय आधुनिक सिंचाई प्रणालियों को अपनाया गया, जिससे भूमि की उत्पादकता में कमी आई है। भूमि के बंजर होने व अन्य कारणों से प्रति व्यक्ति कृषि भूमि क्षेत्र में कमी हो रही है।

बंजरीकरण का पता लगाने और इस समस्या से निपटने के लिए वर्ष 1997 में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जेवी चौधरी की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई थी। इस समिति में सिंचाई, कृषि और वन आदि के विशेषज्ञ भी शामिल थे। इस समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि बंजरीकरण की समस्या पहले सिर्फ राजस्थान में ही थी, लेकिन बाद में इसके प्रभाव क्षेत्र में हरियाणा और पंजाब भी आ गए। विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को रासायनिक खादों का इस्तेमाल धीरे-धीरे बंद करके पारंपरिक जैविक खाद को अपनाना चाहिए। इससे न केवल वे कृषि लागत में कई गुना कमी ला सकते हैं, बल्कि कृषि योग्य भूमि को पुन: उपजाऊ भी बना सकते हैं। गौरतलब है कि हरियाणा में कीटनाशकों के इस्तेमाल से पैदा हुई समस्याओं के चलते जैविक खाद और दूसरे संसाधन प्रयोग किए जाने को लेकर अनुसंधान का काम चल रहा है। हरियाणा में सिरसा एकमात्र ऐसा जिला है, जहां राज्य जैविक नियंत्रण प्रयोगशाला है। इस प्रयोगशाला में बायो प्रोडक्ट तैयार किए जा रहे हैं। यहां ट्राइकोट्रमा नामक जैविक दवा तैयार की गई है जिससे बीज को उपचारित किया जा सकता है। किसानों को यह दवा मुफ्त मुहैया कराई जा रही है। भूमि को उपचारित करने के लिए प्रति एकड में एक किलो दवा को खाद में मिलाकर खेत में छिडक़ा जाता है। प्रयोगशाला के अधिकारी के मुताबिक बायो प्रोडक्ट ज्यादा गर्मी में काम नहीं कर सकते, जबकि कीटनाशकों पर ज्यादा तापमान का कोई असर नहीं पडता। उनका यह भी कहना है कि वर्ष 2004 में बनी इस प्रयोगशाला के वातानुकूलित न होने के कारण बायो प्रोडक्ट के उत्पादन में रुकावट आ रही है।

अलबत्ता, बंजर भूमि की स्थिति पर नियंत्रण पाने के मकसद से 1992 में ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत अलग से बंजर भूमि विकास विभाग स्थापित किया गया और राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड को इसके अंतर्गत रखा गया। भूमि की उत्पादकता में कमी को रोकने और बंजर भूमि के उपयुक्त उपयोग के बेहतर सुझावों की .ष्टि से बोर्ड का पुनर्गठन भी किया गया। फिलहाल सात अरब 78 करोड से 25 राज्यों में 247 समेकित कार्यक्रम चल रहे हैं। इन कार्यक्रमों के तहत 15 लाख 98 हजार हेक्टेयर बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाने का काम हो रहा है।

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जैविक खाद का इस्तेमाल करके कृषि भूमि को बंजर होने से बचाया जा सकता है। उनके मुताबिक आज देश में 5.38 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती हो रही है। उम्मीद है कि वर्ष 2012 तक जैविक खेती का फसल क्षेत्र 20 लाख हेक्टेयर से ज्यादा हो जाएगो। वर्ष 2003 में देश में सिर्फ 73 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती हो रही थी, जो 2007 में बढ़कर 2.27 लाख हेक्टेयर हो गई।

हालांकि सरकार ने किसानों के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं शुरू कीं, जिनमें राष्ट्रीय फसल बीमा योजना, किसान क्रेडिट कार्ड योजना, राष्ट्रीय सिंचाई योजना, कमजोर वर्ग की सहकारी समितियों को सहायता, महिला सहकारी समितियों को सहायता, गैर अतिदेय से संबध्द योजना, कृषि ऋण स्थरीकरण निधि, अनुसूचित जातिध्जनजाति के लिए विशेष योजना, धान आधारित फसल क्षेत्रों में समेकित अनाज विकास कार्यक्रम, गेहूं आधारित फसल क्षेत्रों में समेकित अनाज विकास कार्यक्रम, मोटा अनाज आधारित फसल पध्दति क्षेत्रों में समेकित अनाज विकास कार्यक्रम, विशेष जूट विकास कार्यक्रम, गन्ना आधारित फसल पध्दति क्षेत्रों में सतत् विकास, उर्वरक का संतुलित एवं समेकित प्रयोग, छोटे किसानों में कृषि यंत्रीकरण को प्रोत्साहन, उष्ण कटिबंधीय, सूखा एवं गर्म क्षेत्र के फलों का समेकित विकास, सब्जी बीजों का उत्पादन एवं आपूर्ति, वाणिज्यिक फूलों का विकास, औषधीय एवं सुगंधित पौधों का विकास, जड़ों एवं कंद फसलों का विकास, नारियल एवं काजू का विकास, मसालों के विकास के लिए समेकित कार्यक्रम, मशरूम का विकास, कृषि में प्लास्टिक का प्रयोग, मधुमक्खी पालन, बारानी क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय जलागम विकास परियोजना, सब्जी फसलों के आधारित और प्रमाणन बीज उत्पादन के लिए योजनाएं, नदी घाटी परियोजनाओं एवं बाढ़ प्रवण नदियों के जलागम क्षेत्र में मृदा संरक्षण, क्षारीय मृदा का विकास एवं सुधार और राज्य भूमि प्रयोग बोर्ड आदि शामिल हैं। मगर अज्ञानता और जागरूकता की कमी के चलते देश के छोटे और मझोले किसानों तक इनका लाभ नहीं पहुंच पाया है।

हरियाणा के किसानों ने कृषि की अत्याधुनिक तकनीकों के साथ पारंपरिक विधियों को अपनाकर जहां कृषि लागत को कम किया, वहीं बांगवानी, कृषि वानिकी, मछली पालन, मधुमक्खी पालन और पशुपालन को अपनाकर एक-दूसरे के जरिये लाभ को बढ़ाया। साथ ही डीप इरीगेशन, ऑर्गेनिक फार्मिंग, रो व कीट नियंत्रण, मृदा संरक्षण, उन्नत कृषि, फसल चक्र, जीरो टिलेज, कार्बनिक खाद, उन्नत बीजों का इस्तेमाल, कृषि यंत्रों का बेहतर उपयोग कर उन्होंने सराहनीय कृषि प्रदर्शन किया। इन्हीं में से एक हैं कैथल जिले के चंदाना गांव के निवासी व कैथल के प्रगतिशील किसान क्लब के प्रधान कुशलपाल सिरोही, जो जैविक खाद का इस्तेमाल कर कृषि लागत को कम कर ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। उन्हें औषधीय पौधे, गन्ना, सोयाबीन, गुलाब, अमरूद, नींबू व मशरूम के रिकॉर्ड उत्पादन के लिए कई प्रमाण-पत्र मिल चुके हैं। अनेक राष्ट्रीय व राज्यस्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित सिरोही कहते हैं कि हरित क्रांति का फायदा तभी होगा जब किसानों को जागरूक किया जाए और उनके कल्याण के लिए सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओं का सीधा लाभ उन तक पहुंचे। जैविक खेती कर रहे गुड़गांव जिले के फर्रूख़नगर के निवासी व गुड़गांव किसाल क्लब के अध्यक्ष राव मानसिंह कहते हैं कि परंपरागत जैविक खेती सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्तम है। वे कहते हैं कि वह अपने खेतों में उत्पन्न होने वाले पत्तियों के कचरे और गोबर से केंचुआ खाद बनाते हैं। केंचुए से ही कीटनाशक वर्मीवाश तैयार करते हैं।

यह कहना कतई गलत न होगा कि कृषि की अत्याधुनिक तकनीकों के साथ फायदेमंद पारंपरिक विधियों के इस्तेमाल से दूसरी हरित क्रांति के सपने को साकार किया जा सकता है।


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