ललित गर्ग
मिलावट करने वालों को न तो कानून का भय है और न आम आदमी की जान की परवाह है। दुखद एवं विडम्बनापूर्ण तो ये स्थितियां हैं, जिनमें खाद्य वस्तुओं में मिलावट धडल्ले से हो रही है और सरकारी एजेन्सियां इसके लाइसैंस भी आंख मूंदकर बांट रही है। जिन सरकारी विभागों पर खाद्य पदार्थों की क्वॉलिटी बनाए रखने की जिम्मेदारी है वे किस तरह से लापरवाही बरत रही है, इसका परिणाम आये दिन होने वाले फूड प्वाइजनिंग की घटनाओं से देखने को मिल रहे हैं। मिलावट के बहुरुपिया रावणों ने खाद्य बाजार जकड़ रखा है। नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में देश के खाद्य नियामक एफएसएसएआई के हालात का जो ब्योरा दिया है, वह आंखें खोल देने वाला है। इसके मुताबिक एफएसएसएआई में लापरवाही का यह आलम है कि होटलों-रेस्तरांओं या भोजन व्यवसाय से जुड़ी अन्य गतिविधियों के लिए लाइसैंस देते समय सारे दस्तावेज जमा कराने की औपचारिकता भी यहां पूरी नहीं की जाती, बल्कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हानिकारक एवं अस्वास्थ्यकर अखाद्य पदार्थों को स्वीकृति देकर मिलावट के खिलाफ बने कानूनों का मखौल उड़ाया जाता है। जीवन से खिलवाड़ करती इन त्रासद घटनाओं के नाम पर आम से लेकर खास तक कोई भी चिन्तित नहीं दिखाई दे रहा है, यह स्वास्थ्य के प्रति लोगों की स्वयं की उदासीनता को तो दर्शाता ही है, लेकिन सरकार भी कोई ठोस कार्रवाई करती हुई दिखाई नहीं दे रही है। यह भी प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार का एक घिनौना स्वरूप है।

सीएजी ऑडिट के दौरान जो तथ्य उजागर हुए हैं, वे भ्रष्टाचार को तो सामने लाते ही है साथ-ही-साथ प्रशासनिक लापरवाही को भी प्रस्तुत करते हैं। जीवन से जुडे़ इस मामले में भी गंभीरता नहीं बरती जा रही और आधे से ज्यादा लाइसैंस देने के मामलों में दस्तावेज आधे-अधूरे पाए गए। इसकी जांच की गुणवत्ता भी संदेह के दायरे में है, क्योंकि सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक एफएसएसएआई के अधिकारी जिन 72 लैबरेट्रियों में नमूने जांच के लिए भेजते हैं, उनमें से 65 के पास आधिकारिक मान्यता भी नहीं है। उन्हें यह मान्यता नैशनल अक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबरेट्रीज प्रदान करता है। सीएजी ऑडिट के दौरान जिन 16 प्रयोगशालाओं की जांच की गई उनमें से 15 में योग्य खाद्य विश्लेषक भी नहीं थे। सोचा जा सकता है कि ऐसी हालत में देश में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता बनाए रखने का काम करने वाली सरकारी एजेन्सी की दशा कितनी दयनीय है और वहां कितनी लापरवाही बरती जा रही है। मिलावट रोकने के लिए कई कानून बने हुए हैं। सरकार के कई विभाग एवं अधिकारी इस कार्य के लिये जुटे हुए हैं। अगर सरकार चाहे तो मामलों को गंभीरता से लिया जा सकता है, लेकिन ऐसा नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है। मिलावट की स्थितियां त्यौहारों के समय विकराल रूप धारण कर लेती है। क्योंकि लोग त्योहार के नाम पर सब कुछ स्वीकार कर लेते हैं। वे सोचते हैं कि एक दिन के पर्व को हंसी-खुशी में बिताया जाए, मिठाई या अन्य खाद्य पदार्थों के लिए क्यों हल्ला मचाया जाए। उपभोक्ताओं की इसी मानसिकता का लाभ व्यापारी उठाते हैं और सरकार भी उदासीन बनी रहती है। हमें सोचना चाहिए कि शुद्ध खाद्य पदार्थ हासिल करना हमारा मौलिक हक है और यह सरकार का फर्ज है कि वह इसे उपलब्ध कराने में बरती जा रही कोताही को सख्ती से ले।
चाहे प्रचलित खाद्य सामग्रियों की निम्न गुणवत्ता या उनके जहरीले होने का मततब इंसानों की मौत भले ही हो, पर कुछ व्यापारियों एवं सरकारी अधिकारियों के लिए शायद यह अपनी थैली भर लेने का एक मौका भर है। खाद्य सामग्रियों में मिलावट के जिस तरह के मामले आ रहे हैं, उससे तो लगता इंसान के जीवन का कोई मूल्य नहीं है। पिछली दिवाली पर छापेमारी में बड़ी मात्रा में सिंथेटिक दूध और खोया जब्त किया तो पता चला कि मिलावट करने वाले किस तरह हमारी जान के साथ खिलवाड़ करने में लगे हुए हैं। वे मावे में चाॅक पाउडर से लेकर डीजल तक मिला रहे हैं। इसके अलावा वे मिठाई बनाने में सिंथेटिक कलर और साबुन बनाने के काम में आने वाले तेल का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसी मिलावटी मिठाइयां खाने से अपच, उलटी, दस्त, सिरदर्द, कमजोरी और बेचैनी की शिकायत हो सकती है। इससे किडनी पर बुरा असर पड़ता है। पेट और खाने की नली में कैंसर की आशंका भी रहती है। बात केवल त्यौहारों की ही नहीं है बल्कि आम दिनों में भी हमें शुद्ध मिठाइयां या खाद्य सामग्रियां मिलती है, इसकी कोई गारंटी नहीं है। दिल्ली में तो उन मंडियों की ढंग से मानिटरिंग तक नहीं हो पा रही है जहां मावा बिक रहा है। सरकार फूड इंस्पेक्टरों की कमी का रोना रोती है। हालत यह है कि बाजारों में धूल-धक्कड़ के बीच घोर अस्वास्थ्यकर माहौल में खाद्य सामग्रियां बेची जा रही है।
अभी हमारे देश में डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की प्रचलन विदेशों की तुलना बहुत कम है, यह राहत की बात है। यदि डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का प्रचलन अधिक होता तो मिलावट का कहर ही बरस रहा होता। आज भी हमारे यहां आमतौर पर लोग घरों में बनाए भोजन को ही प्राथमिकता देते हैं लेकिन बदलती जीवनशैली के साथ इस चलन में बदलाव भी आ रहा है। कामकाजी दम्पतियों के लिए घर में खाना बनाना मुश्किल होता है लिहाजा ऐसे घरों में बाहर से खाना पैक करवाना आम बात है। अन्य घरों में भी धीरे-धीरे पैक्ड फूड प्रॉक्ट्स का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। मिलावट की तमाम खबरों, जागरूकता अभियानों और सरकारी सख्ती के बावजूद स्थिति संतोषजनक नहीं है। ऐसे में खाद्य नियामक की ऐसी जर्जरता, लापरवाही एवं खस्ताहालात बहुत चिंताजनक है। आज हमारे पास यह जांचने का भी कोई जरिया नहीं है कि बाजार में प्रचलित खाद्य सामग्रियों के रूप में कितनी खतरनाक चीजें हमारे शरीर में पहुंच रही हैं। कई असाध्य बीमारियों का महामारी का रूप लेते जाना जरूर हमें स्थिति की भयावहता का थोड़ा-बहुत अंदाजा करा देता है। देशवासियों की स्वास्थ्य के साथ ऐसा खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। बेहतर होगा कि सरकार तत्काल सक्रिय हो और युद्ध स्तर पर सारे जरूरी कदम उठाकर इस बदइंतजामी को दूर करे।
मिलावट एक ऐसा खलनायक है, जिसकी अनदेखी जानलेवा साबित हो रही है। इस मामले में जिस तरह की सख्ती चाहिए, वैसी दिखाई नहीं दे रही है। ऐसा होता तो सीएजी ऑडिट रिपोर्ट में ऐसे खौफनाक तथ्य सामने नहीं आते। अगर स्थिति को और बिगड़ने ना दिया जाए, तो कम-से-कम भविष्य में मिलावट से होने वाली बीमारियों के कारण मरने वाले लोगों की संख्या को और बढ़ने से रोका जा सकता है। ऐसा किया जाना जरूरी भी है। लोगों को मरने भी तो नहीं दिया जा सकता। विडम्बनापूर्ण तो यह है कि भारत में सरकार और जनता, दोनों के लिये यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया है। दुखद तो यह भी है कि राजनीतिक दलों के लिये तो इस तरह के मुद्दे कभी भी प्राथमिकता बनते ही नहीं।
मिलावट के नाम पर खतरे की घंटी बनने वाली ये ऐसी विनाशकारी स्थितियां हैं, जिनका आम लोगों के स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ता है, जिस पर ध्यान देना जरूरी है, अन्यथा आए दिन भयानक परिणाम सामने आते रहेंगे। भविष्य धुंधला होता रहेगा। देश में ऐसा कोई बड़ा जन-आन्दोलन भी नहीं है, जो मिलावट के लिये जनता में जागृति लाए। राजनीतिक दल और नेता लोगों को वोट और नोट कबाड़ने से फुर्सत मिले, तब तो इन मनुष्य जीवन से जु़ड़े बुनियादी प्रश्नों पर कोई ठोस काम हो सके।


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