फ़िरदौस ख़ान
हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों के नतीजे बहुत कुछ कहते हैं. इन नतीजों से बहुत से सवाल पैदा होते हैं. इन नतीजों के मद्देनज़र यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जीत गए, लेकिन उनके रणनीतिकार बुरी तरह हार गए. इसमें कोई शक नहीं कि राहुल गांधी ने गुजरात में ख़ूब मेहनत की, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सत्ता के तौर मेहनत को फल नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था या जिसके वे मुसतहक़ थे.

लेकिन इतना ज़रूर हुआ है कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के गृह राज्य में जाकर यह बता दिया है कि वे अकेले दम पर पूरी सरकार से टकरा सकते हैं. कांग्रेस की तरफ़ से जहां अधिकारिक रूप से अकेले राहुल गांधी गुजरात में पार्टी की चुनाव मुहिम संभाले हुए थे, वहीं भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री भी चुनाव प्रचार में दिन-रात जुटे हुए थे. ऐसा लग रहा था, मानो एक अकेले राहुल गांधी के ख़िलाफ़ पूरी सरकार चुनाव में उतर आई है. इतना ही नहीं, मीडिया भी राहुल गांधी के ख़िलाफ़ था. चुनाव आयोग भी पूरी तरह से सरकार के पक्ष में नज़र आ रहा था. जिस तरह चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के साक्षात्कार को लेकर न्यूज़ चैनलों को नोटिस भेजा और भारतीय जनता पार्टी के 8  दिसम्बर पर घोषणा पत्र जारी करने, मतदान वाले दिन प्रधानमंत्री के रोड शो करने आदि मामलों में आंखें मूंद लीं, उसने चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर दिया है.

कांग्रेस ने साबरमती के रानिप में वोट डालने के बाद लोगों की भीड़ को खुली गाड़ी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अभिवादन को चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए कहा था कि चुनाव आयुक्त प्रधानमंत्री के निजी सचिव की तरह काम कर रहा है. कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला और गुजरात चुनाव के प्रभारी अशोक गहलोत का कहना था कि प्रधानमंत्री चुनाव आयोग और प्रशासन के साथ मिलकर गुजरात में रोड शो करके संविधान की धज्जियां उड़ा रहे है. रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि राहुल गांधी का इंटरव्यू दिखाने पर चुनाव आयोग ने टीवी चैनलों और अख़बारों पर एफ़आईआर दर्ज कराने के आदेश दिए, राहुल गांधी को नोटिस भेजा, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की. उन्होंने कहा, 'देश चुनाव आयोग से जानना चाहता है कि 8 दिसंबर को जब बीजेपी चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन कर अहमदाबाद में अपना घोषणा-पत्र जारी करती है, तो चुनाव आयोग मूकदर्शक क्यों बना रहता है. क्या कारण है कि वोटिंग से एक दिन पहले अहमदाबाद एयरपोर्ट जैसी सार्वजनिक संपत्ति पर अमित शाह पत्रकार गोष्ठी करते हैं. क्या कारण है कि एक केंद्रीय मंत्री (पीयूष गोयल) गुजरात को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं.' उन्होंने कहा था कहा कि चुनाव आयोग पूरी तरह पीएम और पीएमओ के दबाव में काम कर रहा है. भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव आयोग को बंधक बना लिया है. इस मुद्दे को लेकर दिल्ली में काग्रेस कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के दफ़्तर के बाहर प्रदर्शन किया था.

भले ही भारतीय जनता पार्टी गुजरात विधानसभा चुनाव जीत गई हो, लेकिन नैतिक रूप से उसकी हार ही हुई है. इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में हुई ग़ड़बड़ी के मामले सामने आने के बाद अवाम के दिल में यह बात बैठ गई है कि चुनाव में धांधली हुई है. हार्दिक पटेल का कहना है,''बेईमानी करके जीत हासिल की है. अगर हैकिंग न हुई होती,तो बीजेपी जीत हासिल नहीं कर पाती. विपक्षी दलों को ईवीएम हैक के ख़िलाफ़ एकजुट होना चाहिए. अगर एटीएम हैक हो सकता है,तो ईवीएम क्यों हैक नहीं हो सकती.''
इसी तरह कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने भी अपना एक पुराना ट्वीट री-ट्वीट करते हुए लिखा है, ''मैं अब भी इस ट्वीट पर क़ायम हूं. अगर ईवीएम से छेड़छाड़ न हुई होती, तो रिज़ल्ट कांग्रेस के पक्ष में होता.'' कांग्रेस कार्यकर्ताओं का आरोप है कि मतगणना में ईवीएम के साथ लगाई गई वोटर वेरीफ़ाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) पर्चियों का मिलान किया जाता, तो कांग्रेस ज़रूर जीत जाती. ग़ौरतलब है कि
कांग्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाख़िल करके मांग की थी कि मतगणना के दौरान कम से कम 20 फ़ीसद वीवीपीएट पर्चियों का ईवीएम से मिलान किया जाए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में दख़ल नहीं दे सकता. सवाल यह है कि अगर ईवीएम में गड़बड़ी नहीं हुई, तो फिर चुनाव आयोग ने मतगणना के दौरान वीवीपीएट पर्चियों का ईवीएम से मिलान क्यों नहीं किया?
सियासी गलियारों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव में पूरी कोशिश की है नतीजा ऐसा रहे कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे, यानी भाजपा की सरकार बन जाए, और एकतरफ़ा चुनाव भी न लगे, ताकि ईवीएम में ग़ड़बड़ी का मुद्दा थम जाए.

हालांकि गुजरात में राहुल गांधी की मेहनत कुछ रंग लाई. जो भारतीय जनता पार्टी 150 सीटें जीतने का दावा कर कर थी, वह महज़ 99 सीटों तक सिमट गई. कांग्रेस ने 61 से 19 सीटों की बढ़ोतरी करते हुए 80 सीटों पर जीत दर्ज कर की है. ख़ास बात ये भी है कि राहुल गांधी ने जिन मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना की, उन इलाक़ों में कांग्रेस ने जीत का परचम लहराया. राज्य में 15 सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस उम्मीदवार कम वोटों के अंतर से चुनाव हारे हैं. ग्रामीण इलाक़ों में भी कांग्रेस को ख़ासा जन समर्थन हासिल हुआ है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी की जीत पर तंज़ करते हुए कहा है कि गुजरात में भाजपा का दो अंकों में सिमट जाना उनके पतन की शुरुआत है. ये गांव, ग़रीब और ग्रामीण की उपेक्षा का नतीजा है. ये भाजपा की तथाकथित जीत है.

दरअसल, कांग्रेस समझ चुकी थी कि गुजरात और हिमाचल उनके साथ से निकल रहा है, इसलिए इन राज्यों के चुनाव नतीजे आने से दो दिन पहले ही यानी 16 दिसम्बर को राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई. कार्यकर्ता राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष के तौर पर पाकर ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे. वे ख़ूब जश्न मना रहे थे, मिठाइयां बांटी जा रही थीं, लेकिन इसके दो दिन बाद आए चुनाव नतीजों ने उनकी ख़ुशी को कम कर दिया. कांगेस कार्यकर्ताओं को जीत न पाने का उतना मलाल नहीं था, जितना दुख इस बात का था कि वे जीत कर भी हार गए. उनका कहना है कि अगर अगर इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन की जगह मतपत्र से मतदान होता, तो कांग्रेस की जीत तय थी.
हालांकि राहुल गांधी ने हिम्मत नहीं हारी है. उन्होंने कहा है कि कांग्रेस गुजरात और हिमाचल प्रदेश में जनता के फ़ैसले का सम्मान करती है और नई सरकारों को शुभकामनाएं देती है, गुजरात और हिमाचल प्रदेश की अवाम ने जो प्यार दिया, उसके लिए तहे-दिल से शुक्रिया.

क़ाबिले-ग़ौर यह भी है कि कांग्रेस की नाकामी की सबसे बड़ी वजह सही रणनीति की कमी है. कांग्रेस के पास या ये कहना ज़्यादा सही होगा कि राहुल गांधी के पास ऐसे सलाहकारों की, ऐसे रणनीतिकारों की बेहद कमी है, जो उनकी जीत का मार्ग प्रशस्त कर सकें. सही रणनीति की कमी की वजह से ही कांग्रेस जीतकर भी हार जाती है. यही वजह है कि कांग्रेस डेमेज कंट्रोल भी नहीं कर पाती. कांग्रेस नेता मणिशंकर के बयान पर उन्हें बर्ख़ास्त करने के बाद भी पार्टी को कोई फ़ायदा नहीं हुआ. कांग्रेस जन हितैषी काम करके भी हार जाती है, जबकि आतंकियों को कंधार पहुंचाने वाले, बिन बुलाए पाकिस्तान जाकर बिरयानी खाने वाले नेताओं की पार्टी जीत जाती है. इसलिए राहुल गांधी को ऐसे सलाहकारों की ज़रूरत है, जो उन्हें कामयाबी की बुलंदियों तक ले जाएं.


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

फ़िरदौस ख़ान का फ़हम अल क़ुरआन पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें

या हुसैन

या हुसैन

फ़िरदौस ख़ान की क़लम से

Star Web Media

सत्तार अहमद ख़ान

सत्तार अहमद ख़ान
संस्थापक- स्टार न्यूज़ एजेंसी

ई-अख़बार पढ़ें

ब्लॉग

  • नजूमी... - कुछ अरसे पहले की बात है... हमें एक नजूमी मिला, जिसकी बातों में सहर था... उसके बात करने का अंदाज़ बहुत दिलकश था... कुछ ऐसा कि कोई परेशान हाल शख़्स उससे बा...
  • कटा फटा दरूद मत पढ़ो - *डॉ. बहार चिश्ती नियामतपुरी *रसूले-करीमص अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि मेरे पास कटा फटा दरूद मत भेजो। इस हदीसे-मुबारक का मतलब कि तुम कटा फटा यानी कटा उसे क...
  • Dr. Firdaus Khan - Dr. Firdaus Khan is an Islamic scholar, poetess, author, essayist, journalist, editor and translator. She is called the princess of the island of the wo...
  • میرے محبوب - بزرگروں سے سناہے کہ شاعروں کی بخشش نہیں ہوتی وجہ، وہ اپنے محبوب کو خدا بنا دیتے ہیں اور اسلام میں اللہ کے برابر کسی کو رکھنا شِرک یعنی ایسا گناہ مانا جات...
  • इंदिरा गांधी हिम्मत और कामयाबी की दास्तां - *डॉ. फ़िरदौस ख़ान* ’लौह महिला’ के नाम से मशहूर इंदिरा गांधी न सिर्फ़ भारतीय राजनीति पर छाई रहीं, बल्कि विश्व राजनीति के क्षितिज पर भी सूरज की तरह चमकीं. उनकी ...
  • 25 सूरह अल फ़ुरक़ान - सूरह अल फ़ुरक़ान मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 77 आयतें हैं. *अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है*1. वह अल्लाह बड़ा ही बाबरकत है, जिसने हक़ ...
  • ਅੱਜ ਆਖਾਂ ਵਾਰਿਸ ਸ਼ਾਹ ਨੂੰ - ਅੱਜ ਆਖਾਂ ਵਾਰਿਸ ਸ਼ਾਹ ਨੂੰ ਕਿਤੋਂ ਕਬੱਰਾਂ ਵਿਚੋਂ ਬੋਲ ਤੇ ਅੱਜ ਕਿਤਾਬੇ-ਇਸ਼ਕ ਦਾ ਕੋਈ ਅਗਲਾ ਵਰਕਾ ਫੋਲ ਇਕ ਰੋਈ ਸੀ ਧੀ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਤੂੰ ਲਿਖ ਲਿਖ ਮਾਰੇ ਵੈਨ ਅੱਜ ਲੱਖਾਂ ਧੀਆਂ ਰੋਂਦੀਆਂ ਤ...

एक झलक

Followers

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

साभार

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं