डॉ. फ़िरदौस ख़ान
इंसान सुकून की तलाश में न जाने कहां-कहां भटकता है, लेकिन सुकून उसे सिर्फ़ अल्लाह की पनाह में ही मिलता है. अल्लाह के ज़िक्र से मिलता है. जिस तरह बारिश की बूंदें प्यासी सूखी धरती को सराबोर कर देती हैं, उसी तरह ज़िक्रे इलाही से दिल को क़रार मिलता है, रूह को तस्कीन मिलती है.
ज़िक्रे इलाही की बेशुमार फ़ज़ीलतें हैं. क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है.
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- "याद रखो कि अल्लाह ही की याद से दिलों को इत्मीनान नसीब होता है." (क़ुरआन 13:28)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “फिर तुम हमारा ज़िक्र किया करो, तो हम भी तुम्हारा ज़िक्रे खै़र किया करेंगे. और हमारा शुक्र अदा करते रहा करो और नाशुक्री न किया करो.
(क़ुरआन 2:152)
अल्लाह की कायनात की तमाम मख़लूक़ात ज़िक्रे इलाही में ही मसरूफ़ रहती है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “और आसमानों और ज़मीन की तमाम मख़लूक़ अल्लाह ही को सजदा करती है, कुछ ख़ुशी से कुछ नागवारी से. और उनके साये भी सुबह व शाम उसी को सजदा करते हैं.”
(क़ुरआन 13:15)
“सातों आसमान और ज़मीन और जो कुछ इनके दरम्यान है, सब अल्लाह की तस्बीह करते हैं. और कोई शय ऐसी नहीं है, जो उसकी हम्दो सना की तस्बीह न करती हो.”
(क़ुरआन : 17:44)
“और जो आसमानों और जो ज़मीन में हैं, सब अल्लाह ही की मख़लूक़ है. और जो क़ुर्बे इलाही में रहते हैं, वे न उसकी इबादत का तकब्बुर करते हैं और न उसकी इताअत से थकते हैं.
वे रात और दिन अल्लाह ही की तस्बीह किया करते हैं और कभी काहिली नहीं करते.”
(क़ुरआन 21:19-20)
“क्या तुमने नहीं देखा कि आसमानों और ज़मीन की हर शय अल्लाह ही की तस्बीह करती है. और परिन्दे भी फ़ज़ाओं में पर फैलाए हुए उसी की तस्बीह करते हैं. हर एक अपनी नमाज़ और अपनी तस्बीह का तरीक़ा जानता है.”
(क़ुरआन 24:41)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने हुक्म दिया है- “और तुम पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो और ज़कात दिया करो और रुकू करने वालों के साथ रुकू किया करो.” (क़ुरआन 2:43)
“अपने परवरदिगार का कसरत से ज़िक्र करो और शाम और सुबह अल्लाह की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 3:41)
“और अपने परवरदिगार का अपने दिल में ज़िक्र किया करो, आजिज़ी से और ख़ौफ़ से और बुलंद आवाज़ के बग़ैर यानी धीमी आवाज़ से सुबह और शाम. और उसकी याद से ग़ाफ़िल न होना.
बेशक जो लोग यानी फ़रिशते तुम्हारे परवरदिगार के हुज़ूर में हैं, वे भी उसकी इबादत से तकब्बुर नहीं करते और उसकी तस्बीह करते रहते हैं और उसी को सजदा करते हैं.”
(क़ुरआन 7: 205-206)
“तुम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो और उसकी बारगाह में सजदा करने वालों में से हो जाओ.”
(क़ुरआन 15:98)
“तुम लोग सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन : 19:11)
“और सूरज के तुलूअ होने से पहले यानी फ़ज्र की नमाज़ में और सूरज के ग़ुरूब होने से पहले यानी अस्र की नमाज़ में अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो. और रात के इब्तियाई लम्हों में भी यानी मग़रिब और इशा की नमाज़ों में भी तस्बीह किया करो और दिन के किनारों यानी ज़ुहर की नमाज़ में भी तस्बीह किया करो,
(क़ुरआन 20:130)
“इंसान और जिन्न ही नहीं दीगर बेजान चीज़ें भी अल्लाह की ही तस्बीह करती हैं. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “और हमने पहाड़ों और परिन्दों को दाऊद अलैहिस्सलाम के ताबे कर दिया था. वे उनके साथ अल्लाह की तस्बीह किया करते थे. और हम ही यह सब करने वाले थे.”
(क़ुरआन 21:79)
जिस जगह अल्लाह तआला का ज़िक्र किया जाता है, वह जगह नूर से मुनव्वर हो जाती है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “अल्लाह का यह नूर उन घरों में है, जिन्हें अल्लाह ने बुलंद करने का हुक्म दिया है, जिनमें अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है और सुबह व शाम अल्लाह के नाम की तस्बीह की जाती है.”
(क़ुरआन 24:36)
अल्लाह की तमाम मख़लूक़ का ये फ़र्ज़ है कि वह सिर्फ़ और सिर्फ़ माबूदे यकता की हम्दो सना के साथ तस्बीह करती रहे. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “उसकी हम्दो सना की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 25:58)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उस किताब की तिलावत किया करो, जो तुम्हारे पास वही की गई है. और पाबंदी से नमाज़ पढ़ो. बेशक नमाज़ बेहयाई और बुराई से रोकती है. और अल्लाह का ज़िक्र सबसे बड़ा है.”
(क़ुरआन 29:45)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “फिर तुम सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह किया रहो. और आसमानों और ज़मीन में अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं. और तुम तस्बीह किया करो तीसरे पहर और दोपहर में भी.”
(क़ुरआन 30:17-18)
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “ऐ ईमान वालो ! तुम कसरत से अल्लाह का ज़िक्र किया करो.
और सुबह व शाम उसकी तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 33:41-42)
“जो फ़रिश्ते अर्श को उठाए हुए हैं और जो उसके अतराफ़ हैं, वे सब अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहते हैं और उस पर ईमान रखते हैं और ईमान वालों के लिए मग़फ़िरत की दुआएं मांगते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार ! तेरी रहमत और तेरा इल्म हर चीज़ का अहाता किए हुये है. फिर जिन लोगों ने तौबा की और तेरे रास्ते की पैरवी की. और तू उन्हें जहन्नुम के अज़ाब से बचा ले.
(क़ुरआन 40:7)
“सुबह व शाम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 40:55)
“जो फ़रिश्ते तुम्हारे परवरदिगार की बारगाह में हैं, वे रात दिन उसकी तस्बीह करते रहते हैं और वे कभी थकते भी नहीं हैं.”
(क़ुरआन 41:38)
“फ़रिश्ते अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करते रहते हैं और ज़मीन में रहने वाले लोगों के लिए मग़फ़िरत की दुआ मांगते रहते हैं.”
(क़ुरआन 42:5)
“और सुबह व शाम अल्लाह की तस्बीह करते रहो.”
(क़ुरआन 48:9)
“और तुम सूरज निकलने से पहले और सूरज छुपने से पहले अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो. और रात में भी कुछ वक़्त तस्बीह करो और सजदों यानी नमाज़ों के बाद भी उसकी तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 50:39-40)
“जब तुम उठा करो, तो अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो.
और तुम रात में कुछ वक़्त और सितारों के ग़़ुरूब होने के बाद भी तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 52:48-49)
“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 56:74)
“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो.”
(क़ुरआन 56:86)
“हर वह शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 57:1)
“हर वह शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 59:1)
“आसमानों और ज़मीन की हर शय उसी की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 59:24)
“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 61:1)
“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है, जो हक़ीक़ी बादशाह है, पाक है.”
(क़ुरआन 62:1)
“हर शय, जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है, अल्लाह की तस्बीह करती है.”
(क़ुरआन 64:1)
“तुम अपने अज़ीम परवरदिगार के नाम की तस्बीह करते रहो.”
69:52
“और तुम सुबह और शाम अपने परवरदिगार के नाम का ज़िक्र करते रहो. और रात में कुछ वक़्त उसकी बारगाह में सजदा करो और रात के बाक़ी तवील हिस्से में उसकी तस्बीह किया.”
(क़ुरआन 76: 25-26)
“ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! अपने परवरदिगार के नाम की तस्बीह किया करो, जो सबसे आला है.”
(क़ुरआन 87:1)
“फिर तुम अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह करो.”
(क़ुरआन 110:3)
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अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अपनी ज़ुबान को हर वक़्त अल्लाह के ज़िक्र से तर रखो.”
(सुनन तिर्मिज़ी : 3375)
अल्लाह के महबूब और हमारे प्यारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह तअला के कुछ फ़रिश्ते ज़मीन में चक्कर लगाते रहते हैं, वे अल्लाह के ज़िक्र की मजलिसें तलाश करते हैं, जब वे ऐसी कपि मजलिस तलाश कर लेते हैं, जिसमें अल्लाह का ज़िक्र हो रहा होता है, तो वे उन लोगों के साथ बैठ जाते हैं.”
(सही मुस्लिम : 6839)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "जो लोग अल्लाह का ज़िक्र करने के लिए जमा होते हैं फ़रिश्ते उन्हें घेर लेते हैं, रहमत उन्हें ढांप लेती है, सकीनत नाज़िल होती है और अल्लाह उनका ज़िक्र अपने पास मौजूद फ़रिश्तों में फ़रमाता है."
(सही मुस्लिम : 2700, जामा तिर्मिज़ी 3378)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “बन्दा जब नमाज़ पढ़ रहा होता है, तो उसके सिर पर रहमतों की बारिश हो रही होती है.
(तिर्मिज़ी : 2911)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह फ़रमाता है कि अगर मेरा बन्दा एक हाथ मेरे क़रीब आता है, तो मैं दोनों हाथ की पूरी लम्बाई के बराबर उसके क़रीब आता हूं.”
(सही मुस्लिम : 6806)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जब तक कोई शख़्स अपनी नमाज़ की जगह पर बैठा रहता है, फ़रिश्ते उसके लिए अल्लाह से मग़फ़िरत और रहमत की दुआ करते रहते हैं- ऐ अल्लाह! इसे बख़्श दे, ऐ अल्लाह! इस पर रहम कर.”
(सही बुख़ारी : 445)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- " जो शख़्स फ़ज्र की नमाज़ पढ़कर सूरज निकलने तक ज़िक्रे इलाही में मशग़ूल रहे, फिर वह दो रकआत नमाज़ पढ़े, तो उसे पूरे हज और उमराह का अज्र मिलता है."
(सुनन तिर्मिज़ी : 586)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "मैं ऐसे लोगों के साथ बैठा रहूं जो अस्र की नमाज़ से सूरज ग़ुरूब होने तक अल्लाह का ज़िक्र करें. ये उससे ज़्यादा पसंदीदा है कि वे चार ग़ुलाम आज़ाद करें."
(सुनन अबू दाऊद : 3667)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो मुसलमान मर्द नमाज़ और ज़िक्रे इलाही के लिए पाबंदी से मस्जिद में हाज़िर होता है, तो अल्लाह तआला उससे इस तरह ख़ुश होता है, जिस तरह मुसाफ़िर के घरवाले उसके घर आपने पर ख़ुश होते हैं.”
(सुनन इब्ने माजा : 800)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “तुम इबादत और नेकी में देर न करो और ये न सोचो कि बाद में कर लेंगे, क्योंकि ज़िन्दगी में ऐसे हालात आ सकते हैं जो इंसान को अल्लाह की इताअत से रोक देते हैं.”
(मिश्कात-उल-मसाबीह : 5175)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स अल्लाह अपने रब का ज़िक्र करे और जो अल्लाह का ज़िक्र न करे उनकी मिसाल ज़िन्दा और मुर्दे की तरह हैं.” कहने का मतलब ये है कि अल्लाह का ज़िक्र करने वाला ज़िन्दा है और ज़िक्र न करने वाला मुर्दे की तरह है. इस बात से अल्लाह के ज़िक्र की अहमियत का पता चलता है.
(सही बुख़ारी : 6407)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “क्या मैं तुम्हें तुम्हारे आमाल में से बेहतरीन और तुम्हारे मालिक के नज़दीक सबसे पाकीज़ा अमल न बताऊं? वह अल्लाह का ज़िक्र करना है, जो सोना और चाँदी ख़र्च करने से भी बेहतर है.”
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह के नज़दीक सबसे पसंदीदा वो लोग हैं, जो अल्लाह का ज़िक्र कसरत से करते हैं.”
(जामा अल ज़ायद: 16748)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स उस वक़्त खड़ा हो, जब सूरज बुलन्द हो चुका हो, फिर अच्छी तरह वुज़ू करके दो रकआत नमाज़ पढ़े, तो उसके गुनाह बख़्श दिए जाएंगे और वह ऐसा हो जाएगा जैसे उसकी माँ ने उसे उसी वक़्त जन्म दिया हो.”
(मुसनद अहमद : 2250)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जन्नत की कुंजी नमाज़ है और नमाज़ की कुंजी पाकी है.”
(सही मुस्लिम)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “बेशक तुममें से कोई जब नमाज़ के लिए खड़ा होता है, तो शैतान उसे शुब्ह में डाल देता है. यहां तक कि वह नहीं जानता कि उसने कितनी रकआत पढ़ी हैं. तुममें से जब कोई कोई ये कैफ़ियत तो बैठे हुए दो सजदे कर ले.” (मुस्लिम : 1265)
हज़रत हातिम रहमतुल्लाह अलैह जब नमाज़ पढ़ते थे, तो ये तसव्वुर बांध लेते थे-
निगाहों के सामने काबा है.
नीचे पुल सिरात है.
दायें जन्नत है.
बायें जहन्नुम है.
पीछे मौत का फ़रिश्ता है.
और ये नमाज़ ज़िन्दगी की आख़िरी नमाज़ है.
अल्लाह की रहमत से अपनी नमाज़ क़ुबूल होने की उम्मीद रखते थे.
और अपने बदआमालों से नमाज़ के मरदूद होने का ख़ौफ़ रखते थे.
