डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
माहे रमज़ान में हर तरफ़ ज़ायक़ेदार पकवानों की बहार रहती है. रमज़ान का ज़िक्र लज़ीज़ पकवानों के बग़ैर मुकम्मल ही नहीं होता. रमज़ान का ख़ास पकवान है फैनी, सेवइयां और खजला. सुबह सहरी के वक़्त फ़ैनी को दूध में भिगोकर खाया जाता है. इसी तरह सेवइयों को दूध और मावे के साथ पकाया जाता है. फिर इसमें चीनी और मेवे मिलाकर परोसा जाता है. इसके अलावा मीठी डबल रोटी भी सहरी का एक ख़ास व्यंजन है. ख़ास तरह की यह मीठी डबल रोटी अमूमन रमज़ान में ही ज़्यादा देखने को मिलती है.

इफ़्तार के पकवानों की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है. अमूमन रोज़ा खजूर से ही खोला जाता है. दिनभर के रोज़े के बाद शिकंजी और तरह-तरह के शर्बत गले को तर करते हैं. फलों की चाट इफ़्तार के खाने का एक अहम हिस्सा है. ताज़े फलों की चाट रोज़े के बाद ताज़गी का अहसास तो कराती ही है, साथ ही यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होती है. इसके अलावा ज़ायक़ेदार पकौड़ियां और तले हुए मसालेदार चने भी रोज़ेदारों की पसंद में शामिल हैं. खाने में बिरयानी, नहारी, क़ौरमा, क़ीमा, नरगिसी कोफ़्ते, कबाब और गोश्त से बने दूसरे लज़ीज़ पकवान शामिल रहते हैं. इन्हें रोटी या नान के साथ खाया जाता है. रुमाली रोटी भी इनके ज़ायके को और बढ़ा देती है. इसके अलावा बाकरखानी भी रमज़ान में ख़ूब खाई जाती है. यह एक बड़े बिस्कुट जैसी होती है और इसे क़ौरमे के साथ खाया जाता है. बिरयानी में मुरादाबादी बिरयानी और हैदराबादी बिरयानी का जवाब नहीं. मीठे में ज़र्दा, शाही टुकड़े, फिरनी और हलवा-परांठा दस्तरख़्वान की ज़ीनत बढ़ाते हैं.

जन्नत कहती हैं कि रमज़ान में यूं तो दिन में ज़्यादा काम नहीं होता, लेकिन सहरी के वक़्त और शाम को काम बढ़ जाता है. इफ़्तार के लिए खाना तो घर में ही तैयार होता है, लेकिन रोटियों की जगह हम बाहर से नान या रुमाली रोटियां मंगवाना ज़्यादा पसंद करते हैं. रोज़े की हालत में देर तक बावर्चीख़ाने में आंच के पास खड़ा नहीं हुआ जाता. इससे प्यास की शिद्दत बढ़ जाती है और कभी-कभार चक्कर भी आने लगते हैं.     

वज़न और मर्ज़ का बढ़ना 
रमज़ान में महीनेभर रोज़े रखे जाते हैं. रोज़ेदार दिनभर भूखे और प्यासे रहते हैं. इसके बावजूद देखने में आता है कि बहुत से लोगों के वज़न में इज़ाफ़ा हो जाता है. इतना ही नहीं, शुगर भी बहुत बढ़ जाती है. जिन लोगों को शुगर नहीं है, उनके ख़ून में भी शुगर की मात्रा बहुत बढ़ जाती है. और जिन्हें शुगर है, उनकी हालत तो बहुत ही बुरी हो जाती है. बहुत से लोगों को तो अस्पताल में दाख़िल होना पड़ जाता है. इसकी वजह ये है कि वे अपने खाने-पीने पर तवज्जो नहीं देते. रमज़ान में इफ़्तारी में शर्बत पिये जाते हैं, तरबूज़ और ख़रबूज़े खाए जाते हैं. फलों की चाट खाई जाती है. दिल्ली में बनने वाली फलों की चाट को कचालू कहा जाता है. इसमें कई तरह के फल शामिल होते हैं. इसमें चाट मसाले के साथ बहुत सी शक्कर भी मिलाई जाती है, जिससे इसकी मिठास बहुत बढ़ जाती है. इफ़्तारी में जलेबियां भी शामिल होती हैं, जो शीरे में तर होती हैं. फिर सहरी में दूध जलेबी, खजला, फैनी, मीठी डबल रोटी खाई जाती है. मीठा दूध पिया जाता है. अब जब इतना मीठा खाया जाएगा, तो शुगर बढ़ना तो लाज़िमी ही है.

चिकित्सकों का कहना है कि रमज़ान में मीठे का इस्तेमाल ज़्यादा होने की वजह से शुगर बढ़ जाती है. ईद के आसपास जो भी व्यक्ति शुगर की जांच करवाता है, तो उसकी शुगर बढ़ी हुई आती है. अकसर लोग रिपोर्ट देखकर डर जाते हैं और गुमान करते हैं कि उन्हें शुगर का मर्ज़ हो गया है, जबकि ऐसा नहीं होता. इसलिए ईद के 20-25 दिन बाद ही शुगर की जांच करवानी चाहिए, तभी ख़ून में शुगर की सही मात्रा का पता चल सकेगा.   
             
इसी तरह इफ़्तारी में पकौड़े, समौसे, कचौरियां, कबाब और तले हुए पापड़ वग़ैरह ख़ूब खाए जाते हैं. इनमें तेल का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल किया जाता है. ऐसी हालत में वज़न बढ़ना तो तय है. इसलिए रमज़ान में खान-पान पर ख़ास तवज्जो देकर सेहत संबंधी परेशानियों से बचा जा सकता है.  

क्या खायें 
अल्लाह ने इंसानों को ख़ूब रिज़्क़ अता किया है, जिसमें तमाम तरह के फल, मेवे, सब्ज़ियां, अनाज और गोश्त शामिल है. इनमें से इंसान को वही चीज़ें खाने का हुक्म है, जो हलाल क़रार दी गई हैं.  
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और जो हलाल पाकीज़ा रिज़्क़ अल्लाह ने तुम्हें दिया है, उसमें से खाओ व पियो और अल्लाह से डरते रहो, जिस पर तुम ईमान रखते हो.”
(क़ुरआन 5:88)

खाने के भी आदाब हुआ करते हैं. जो निवाला हम खाते हैं, वह कितने ही मरहलों से गुज़र कर हम तक पहुंचता है. अनाज, सब्ज़ियां, फल और मेवे खेतों और बाग़ों से होते हुए बाज़ार पहुंचते हैं और फिर न जाने कितने हाथों से होकर हमारे दस्तरख़्वान तक आते हैं. इन्हें अपने दस्तरख़्वान तक लाने के लिए हमें कितनी मेहनत करनी पड़ती है. ये खाना ही तो है, जिसके लिए इंसान दिन-रात मेहनत करता है और देस से परदेस जाता है, अपना घर-परिवार छोड़कर न जाने कहां-कहां की ख़ाक छानता फिरता है. इसलिए वक़्त पर जो खाना मिले, अल्लाह का शुक्र अदा करके उसे खा लेना चाहिए. खाने में ऐब नहीं निकालने चाहिए. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने परवरदिगार के ज़िक्र के साथ खाना नोश फ़रमाया करते थे. बन्दा जब खाना खाता है, तो उसे इस बात का अहसास होना चाहिए कि ये रिज़्क़ अल्लाह ने अता किया है. ये उसका हम पर कितना बड़ा करम है कि वह अपने बन्दों को रिज़्क़ देना नहीं भूलता. 

खाना ज़रूरत से ज़्यादा नहीं खाना चाहिए. अकसर लोग कहते हैं कि पेट भर गया, लेकिन नीयत नहीं भरी, इसलिए ज़्यादा खाना खा लिया. अगर इतना ही खाना खाए जाए, जितनी जिस्म को ज़रूरत है, तो ये सेहत के लिए बेहतर है. पेट का एक तिहाई हिस्सा खाने के लिए, एक तिहाई पानी के लिए और एक तिहाई हवा के लिए रखना चाहिए. जब भूख लगे, तभी खाना चाहिए और थोड़ी सी भूख बाक़ी रहने पर खाना छोड़ देना चाहिए. ऐसा करने से जो कुछ खाया है, वह जिस्म को लगेगा और सेहत भी अच्छी रहेगी. 

सहरी के वक़्त ऐसी चीज़ें खानी चाहिए, जिससे दिनभर जिस्म को ताक़त मिलती रहे. इसलिए सहरी में प्रोटीन और फ़ाइबर से भरपूर चीज़ें खानी चाहिए. इन्हें खाने से लम्बे वक़्त तक प्यास और भूख नहीं लगती. इस दौरान ज़्यादा से ज़्यादा दूध पीना चाहिए. पानी भी ख़ूब पीना चाहिए, ताकि प्यास की शिद्दत देर से शरू हो. सहरी में खजूर खाना भी बहुत ही मुफ़ीद है.  

एक हदीस में अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “खजूर बेहतरीन सहरी है.“ एक अन्य हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- ”खजूर मोमिन की अच्छी सेहरी है.“ 

इंसान के जिस्म में बहुत से ज़हरीले तत्व इकट्ठे होते रहते हैं, जिससे कई तरह की बीमारियां पैदा हो जाती हैं. एक हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “नाश्ते में खजूर खाओ, ताकि तुम्हारे जिस्म में मौजूद जरासीम का ख़ात्मा हो जाए. एक हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जिस शख़्स ने नहार मुंह अज्वा खजूर के सात दाने खाए, उस दिन उसे न कोई ज़हर नुक़सान पहुंचाएगा और न कोई जादू.”
(मुस्लिम, अबू दाऊद)   

खजूर इफ़्तारी की जान है. इसके बिना इफ़्तारी मुकम्मल ही नहीं होती. खजूर फल भी है और मेवा भी है. इसमें कार्बोहाइड्रेट, आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम, प्रोटीन, मैंगनीज़, मैग्नीशियम, फ़ॉस्फ़ोरस, विटामिन बी6, विटामिन ए, विटामिन के और फ़ाइबर आदि पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो हमारे जिस्म को बीमारियों से बचाते हैं. खजूर की तरह अंगूर भी फल और मेवा दोनों ही तौर पर बेहद फ़ायदेमंद है. तरबूज़ रोज़े के दौरान जिस्म में हुई पानी की कमी को पूरा करता है. 

क्या न खाएं 
रमज़ान में अल्लाह रिज़्क़ में इज़ाफ़ा कर देता है. इसलिए अल्लाह की अता की हुई हर नेअमत चखें. लेकिन इस बात का ख़्याल रखें कि इतना ही खाएं, जितनी ज़रूरत हो. जिन लोगों को शुगर है, उन्हें मीठा खाने से परहेज़ करना चाहिए. रक्तचाप के मरीज़ों को भी अपनी सेहत का ख़्याल रखते हुए ऐसी चीज़ें खाने से गुरेज़ करना चाहिए, जिनसे उनका रक्तचाप बढ़ सकता है. जिन लोगों को कोलेस्ट्रॉल की परेशानी है, उन्हें तले हुए खाने से बचना चाहिए. ऐसा न करने पर उन्हें हृदय संबंधी समस्या हो सकती है. दिल के मरीज़ों को भी तली हुई और मसालेदार चीज़ें खाने से गुरेज़ करना चाहिए. थायरॉइड के मरीज़ भी खाने पीने का ख़ास ख़्याल रखें. जिन लोगों का वज़न बहुत ज़्यादा है, उन्हें तली हुई और मिर्च-मसालेदार चीज़ों से दूर रहना चाहिए, वरना उनके वज़न में और ज़्यादा इज़ाफ़ा हो जाएगा, जो उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं है. 

जो लोग नियमित रूप से दवाएं खा रहे हैं, उन्हें सहरी में और इफ़्तार के बाद फ़ौरन दवा खा लेनी चाहिए. बेहतर होगा कि जो लोग किसी बीमारी में मुब्तिला हैं, वे चिकित्सक की सलाह पर ही रोज़ा रखने का फ़ैसला करें. वैसे भी अल्लाह ने बीमारी की हालत में रोज़ा रखने में छूट दी है. अगर कोई शख़्स बीमारी या ऐसी ही किसी और वजह से रोज़ा रखने की ताक़त न रखता हो, तो उस पर रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ नहीं हैं.

ख़ास बात ये भी है कि खाना खाते वक़्त पानी न पिया जाए. खाना खाने के कम से कम आधे घंटे बाद पानी पीना चाहिए. लेकिन इफ़्तार के वक़्त ऐसा नहीं हो पाता. प्यास की शिद्दत की वजह से रोज़ेदार एक साथ बहुत ज़्यादा पानी पी लेते हैं. ऐसा करने से बचना चाहिए, क्योंकि ये सेहत के लिए ठीक नहीं है. कोशिश करें कि घूंट-घूंट पानी पियें. इससे प्यास बुझ जाती है. नीम्बू का शर्बत या शिकंजी बेहतरीन ग़िज़ा है. इससे प्यास भी बुझती है और जिस्म में पोषक तत्वों की कमी भी कुछ हद तक पूरी होती है. 

रमज़ान में ज़्यादा चाय, कॉफ़ी और कोल्ड ड्रिंक्स से परहेज़ करना चाहिए, क्योंकि ये सभी चीज़ें जिस्म में मौजूद पानी को सोख लेती हैं. इन चीज़ों से एसिडिटी की समस्या भी हो सकती है. रमज़ान में कच्चा लहसुन और कच्ची प्याज़ खाने से भी बचना चाहिए. वैसे भी कच्चा लहसुन और कच्ची प्याज़ खाकर मस्जिद में नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इनकी बू से दूसरों को परेशानी होती है.

सबसे अहम बात ये भी है कि इंसान को सिर्फ़ हलाल रिज़्क़ ही खाना चाहिए. बेईमानी से कमाए गये पैसे से ख़रीदा गया रिज़्क़ हलाल तो नहीं हो सकता. इसलिए ख़ुद को उन कामों से बचाएं, जिन्हें अल्लाह ने हराम क़रार दिया है. अल्लाह ने मेहनत-मशक़्क़त की कमाई में बरकत दी है. बहरहाल, रमज़ान में अपनी सेहत का ख़ास ख़्याल रखें. अगर सेहत सही होगी, तभी तो इबादत भी हो पाएगी. 
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)  
साभार आवाज़ 
तस्वीर गूगल   


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