राजेश कुमार गुप्ता
हिंदी फिल्मों में दीप्ति नवल की पहचान कलात्मक फ़िल्मों की अभिनेत्री के रूप में रही। चश्मे बद्दूर, रंग बिरंगी, कथा, किसी से न कहना, साथ-साथ, इत्यादि इनकी लोकप्रिय फ़िल्में हैं। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कविताएं भी लिखती हैं। 1981 में इनका एक कविता संग्रह "लम्हा-लम्हा" प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा 2011 में "The Mad Tibetan: Stories from then and Now" और 2022 में "A Country Called Childhood: A Memoir" नामक दो पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्हीं की एक कविता "रेगिस्तान की रात है"
रेगिस्तान की रात है
और आँधियाँ सी
बनते जाते हैं निशां
मिटते जाते हैं निशां
दो अकेले से क़दम
ना कोई रहनुमां
ना कोई हमसफ़र
रेत के सीने में दफ़्न हैं
ख़्वाबों की नर्म साँसें
यह घुटी-घुटी सी नर्म साँसें ख़्वाबों की
थके-थके दो क़दमों का सहारा लिए
ढूँढ़ती फिरती हैं
सूखे हुए बयाबानों में
शायद कहीं कोई साहिल मिल जाए
रात के आख़री पहर से लिपटे इन ख़्वाबों से
इन भटकते क़दमों से
इन उखड़ती सांसों से
कोई तो कह दो!
भला रेत के सीने में कहीं साहिल होते हैं...
हिंदी फिल्मों में दीप्ति नवल की पहचान कलात्मक फ़िल्मों की अभिनेत्री के रूप में रही। चश्मे बद्दूर, रंग बिरंगी, कथा, किसी से न कहना, साथ-साथ, इत्यादि इनकी लोकप्रिय फ़िल्में हैं। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कविताएं भी लिखती हैं। 1981 में इनका एक कविता संग्रह "लम्हा-लम्हा" प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा 2011 में "The Mad Tibetan: Stories from then and Now" और 2022 में "A Country Called Childhood: A Memoir" नामक दो पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्हीं की एक कविता "रेगिस्तान की रात है"
रेगिस्तान की रात है
और आँधियाँ सी
बनते जाते हैं निशां
मिटते जाते हैं निशां
दो अकेले से क़दम
ना कोई रहनुमां
ना कोई हमसफ़र
रेत के सीने में दफ़्न हैं
ख़्वाबों की नर्म साँसें
यह घुटी-घुटी सी नर्म साँसें ख़्वाबों की
थके-थके दो क़दमों का सहारा लिए
ढूँढ़ती फिरती हैं
सूखे हुए बयाबानों में
शायद कहीं कोई साहिल मिल जाए
रात के आख़री पहर से लिपटे इन ख़्वाबों से
इन भटकते क़दमों से
इन उखड़ती सांसों से
कोई तो कह दो!
भला रेत के सीने में कहीं साहिल होते हैं...
