राजवंत संधु
पूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता संबंधी सुविधाएं सुनिश्चित करने संबंधी सरकार का एक व्यापक कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य खुले में मलत्याग या शौच की आदत पर पूरी तरह रोक लगाना और स्वच्छ वातावरण बनाना है। सरकार ने ग्रामीण स्वच्छता को सर्वाधिक महत्त्व दिया है। पिछले पांच वर्षों में ग्रामीण स्वच्छता के लिए आबंटन में लगभग छह गुना वृध्दि हुई है। मार्च 2012 ग्रामीण क्षेत्रों को खुले में मल त्याग से मुक्ति का और मार्च 2010 विद्यालय और आंगनबाड़ी शौचालय इकाइयों के निर्माण को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

लक्ष्य
पूर्ण स्वच्छता अभियान के लक्ष्यों के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन के सामान्य स्तर में सुधार, स्वच्छता वातावरण में सुधार, जागृति और स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा मांग पैदा करना, ग्रामीण क्षेत्रों के सभी स्कूलों और आंगनवाड़ियों में स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध कराना व छात्रों तथा शिक्षकों में स्वास्थ्य संबंधी स्वच्छता की आदतों को बढावा देना, किफायती और उचित प्रौद्योगिकी विकास तथा उनके प्रयोग में लाने को प्रोत्साहित करना एवं पानी तथा गंदगी से फैलने वाली बीमारियों को कम करने का प्रयास करना शामिल है।

पूर्ण स्वच्छता अभियान के अधीन तीस राज्यों केन्द्रशासित प्रदेशों में अब तक 593 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। दिसम्बर 2009 तक निजी शौचालय बढक़र 61 प्रतिशत, स्कूली शौचालय 79 प्रतिशत, आंगनवाड़ियों बालवाड़ियों में 60 प्रतिशत हो गए हैं और 52 प्रतिशत सामुदायिक स्वच्छ परिसरों का निर्माण किया गया है। पूर्ण स्वच्छता अभियान के अधीन शौचालयों के अलावा पानी के कम प्रयोग, देश की विभिन्न जल -भौगोलिक दशाओं संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए स्वच्छता की टिकाऊ प्रणाली और ठोस एवं द्रव मल प्रबंधन शामिल हैं। पेयजल आपूर्ति विभाग स्वच्छता प्रणाली के लाभों के बारे में जागृति बढाने के लिए राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियों तथा अन्य सरकारी विभागों के साथ मिलकर प्रयास कर रहा है।

पारिस्थितिकीय स्वच्छता
विभिन्न भौगोलिक दशाओं में शौचालय निर्माण के विभिन्न विकल्पों के दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं, ताकि उनके बारे में जानकारी और अनुभव को देशभर में फैलाया जा सके। पारिस्थितिकीय स्वच्छता जल भराव उच्च जल पट्टी और शुष्क क्षेत्रों में पानी के कम इस्तेमाल के विकल्पों में से एक है। पारिस्थितिकीय स्वच्छता प्रणालियां किसी व्यक्ति द्वारा एक वर्ष में उत्सर्जित पोषक तत्वों की मात्रा और उनका भोजन तैयार करने के लिए आवश्यक पोषक तत्वों के बीच स्वाभाविक संतुलन बहाल करते हैं।

मानव मल-मूत्र का उक्त स्थान पर या उसे किसी अन्य स्थान पर ले जाकर निपटान करने की परम्परागत स्वच्छता प्रणाली की विभिन्न सीमाएं हैं। जैसे जल संसाधनों के साथ संदूषण की संभावनाएं, अपशिष्ट उत्पादों का निपटान और निपटान की उच्च लागत। जबकि स्वच्छता के पारिस्थितिकीय सिध्दान्तों के अंतर्गत प्रदूषण का परिहार्य करना शामिल है न कि प्रदूषित होने के बाद उसे नियंत्रित करने का प्रयास करना तथा मल-मूत्र और विष्ठा को स्वच्छीकरण के बाद कृषि कार्यों के लिए प्रयोग में लाना शामिल है।

पारिस्थितिकीय स्वच्छता एक नया प्रतिमान है, जिसका उद्देश्य प्राकृतिक तरीके से पौष्टिक तत्वों का पुन:चक्रीकरण करना है। पारिस्थितिकीय स्वच्छता इस समग्र दृष्टिकोण पर आधारित है कि सामग्री प्रवाह पारिस्थितिकीय टिकाऊ मल-जल प्रबंधन प्रणाली का एक हिस्सा है,जिसे उपयोगकर्ताओं की आवश्यकताओं और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाला जा सकता है।

इस दृष्टिकोण से जन- स्वास्थ्य की रक्षा होती है, प्रदूषण की रोकथाम होती है और इसके साथ-साथ अमूल्य पोषक तत्व तथा खाद जमीन को पुन: प्राप्त हो जाती हैं। पौष्टिक तत्वों के पुन:चक्रीकरण से अनाज की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है। इससे घरेलू अपशिष्ट जल और जैव अपशिष्ट में व्याप्त जैव तत्वों, पोषक तत्वों और पुन: इस्तेमाल संबंधी उत्पादक ऊर्जा की बहाली होती है तथा उनका फिर से उत्पादक इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि फिर से प्रयोग मुख्य रूप से कृषि के लिए केन्द्रित है, लेकिन उसके प्रयोग के विकल्प खुले हैं ।

पारिस्थितिकीय स्वच्छता में मल-मूत्र को स्रोत पर ही अलग कर दिया जाता है और उन्हें पानी के साथ मिलाया नहीं जाता। स्वच्छता की इस प्रणाली में बड़ी मात्रा में पानी का रोगजनक तत्वों के साथ संदूषण नहीं होने दिया जाता। इसके अलावा मूत्र- व मल को अलग-अलग संसाधित करने से पोषक तत्वों जैसे फास्फोरस और नाइट्रोजन को प्राप्त करने और उन्हें फिर से प्रयोग में लाना आसान हो जाता है। अवमिश्रण और या संसाधित करने की प्रक्रिया के बाद अलग किए हुए मूत्र को जमीन में साफ-सुथरे स्वास्थ्यकर उर्वरक के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है। इसके विपरीत, विष्ठा या तलछट का आसानी से खाद तैयार किया जा सकता है और जैव अवशिष्ट के साथ मिलाकर अनाज उत्पादन में प्रयोग में लाया जा सकता है। इससे रासायनिक खाद पर हमारी निर्भरता कम हो सकती है।

देश के कुछ भागों में जैसे जम्मू और कश्मीर में लेह- लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में लाहौल- स्पीति में पानी के प्रयोग के बिना पारिस्थितिकीय स्वच्छता की वर्षों पुरानी परम्पराएं चली आ रही हैं। पारिस्थितिकीय स्वच्छता प्रणाली की व्यावहारिकता का जायजा लेने के लिए देश के विभिन्न भागों में कई प्रायोगिक परियोजनाएं शुरू की गई थीं। पारिस्थितिकीय स्वच्छता का पहला आधुनिक शौचालय केरल में 1995 में शुरू किया गया था और तमिलनाडु में इसका सफल प्रयोग किया जा रहा है। तमिलनाडु में सुनामी के बाद हुए पुनर्निर्माण के दौरान इसको व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।

समुदाय संगठन और लोक शिक्षा संबंधी सोसाइटी (स्कोप) ने तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में पारिस्थितिकीय स्वच्छता शौचालयों की 1,000 इकाइयों का निर्माण किया। इसकी विशेषता यह है कि यहां शौचालय के प्रत्येक प्रयोग के लिए प्रयोगकर्ता को 10 पैसे दिए जाते हैं और एकत्र किए गए मूत्र को केले संबंधी राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र द्वारा केले के उत्पादन में अनुसंधान के प्रयोग में लाया जाता है। शौचालय इस्तेमाल करें और पैसे पाएं - ऐसे ये शौचालय पानी की बचत करते हैं और कृषि उत्पादन के लिए खाद भी तैयार करते हैं।

विभिन्न संस्थानों जैसे केला संबंधी राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीबी) और आईआईटी, दिल्ली ने मूत्र और मानवीय वनस्पतिक खाद का कृषि उत्पादन के लिए प्रयोग के कई अध्ययन कार्य किए हैं। वानस्पतिक खाद और मूत्र का प्रयोग रासायनिक उर्वरकों का विकल्प हो सकता है।

सरकार सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के जरिए वैकल्पिक स्वच्छता प्रणाली को प्रोत्साहित कर रही है। देश के विभिन्न भू-वैज्ञानिक क्षेत्रों के लिए उपयुक्त पारिस्थितिकीय स्वच्छता संबंधी मार्ग निर्देश तैयार करने के लिए नवम्बर, 2009 में एक कार्यशाला आयोजित की गई थी। इसके अलावा, सीएसओ गैर-सरकारी संगठनों के साथ भागीदारी में देश भर में पारिस्थितिकीय स्वच्छता शौचालयों के बारे में जागृति पैदा करने और उन्हें बनाने के बारे में अभियान चला रहा है। स्वच्छता संबंधी नए दृष्टिकोणों को बड़े पैमाने पर लागू करने से प्राकृतिक संसाधनों को फिर से प्रयोग में लाने के लाभों के प्रदर्शनों और उन्हें बेहतर तरीके से समझाने में सहायता मिलेगी। विभाग भी पारिस्थितिकीय स्वच्छता प्रणाली के विभिन्न पहलुओं पर अनुसंधान और विकास का समर्थन कर रहा है। समय की मांग है कि स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा की चुनौती के बीच संबंध के बारे में सभी स्तरों पर जागृति पैदा की जाए।


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