यश मालवीय 
मेरा यह अनुभव रहा है कि जब जब मन उदास होने होने को होता है कि ज़ेहन के बंद दरवाजों पर वसंत दस्तक सी देने लगता है और मन कभी गेंदे के फूलों की तरह,तो कभी सरसों के फूलों की तरह खिल उठता है, खिल उठती है अंतरात्मा, गुनगुनाने लगता है मौसम, पिया वसंती रे...। दरअसल वसंत, फागुन की ही भूमिका है और इस भूमिका से हम सबकी भूमिकाएं अपनी अपनी तरह से जुड़ जाती हैं और हमारी रहगुज़र ही फूलों की घाटी सी खुशबू के बादल उठाने लगती है । भीगने लगते हैं हमारे मन प्राण। एक वासंती आलोक की रेशमी परिधि हमें अपने दायरे में लेने लगती है । पत्ती पत्ती में आंखें उग आती हैं और वो हमें अनुराग भरी आंखों से निहारने लगती हैं, हमारे अन्तर में कुछ पिघलने सा लगता है। एक अलौकिक अनुभूति होती है। ऐसा महसूस होने लगता है कि यह संपूर्ण प्रकृति ही एक कविता हो गई है,जिसे वसंत अपने थरथराते अधरों से बांच रहा है , सुगन्ध की एक नदी सी प्रवहमान हो उठती है, तटों पर उत्सव का कलरव सा छा जाता है।
सचमुच यह ऋतु सरसों के फूलों की पीली हल्दी से नहाई चिट्ठियां ही लिख रही है और ऋतुराज के सिर पर पीली पगड़ी से दिन शोभित होने लगे हैं। प्रियतम के मन में मोतीचूर के लड्डू चूर चूर होकर यानी फूट फूटकर मिठास घोल रहे हैं और ज़िंदगी का ज़ायका ही बदल गया है।
यह केवल ऋतु का बदलना नहीं, हमारे मन का बदलना भी है। एकरस हो गए समय का रस से सराबोर हो जाना भी है। आत्मा तक पैठी ठंड की यह विदा हो जाने की बेला है । पूस की रात बीत चुकी है। शुभ दिन धीरे धीरे कदम आगे बढ़ा रहे हैं। ऊन पर रेशम भारी पड़ रहा है। ऊनी यादों का मौसम जा रहा है, सूती समय आ रहा है। एक कहावत याद आ रही है, माघ तिलातिल बाढ़े, फागुन गोड़ी काढ़े। वास्तव में फागुन गोड़ी काढ़ रहा है, संध्या सुंदरी भी बाल काढ़ रही है। उसके बालों में सिंदूरी कंघा फंसा हुआ है, जैसे दूर दूर तक फैली नदी की लहरों पर पुल कंघे की तरह कसा हुआ है। न चुकने वाली यादों की एक तहसील सी  बस रही है, दोहा याद आ रहा है
दूर दूर तक बिछ गई, सरसों मीलों मील 
बसते बसते बस गई, यादों की तहसील।।
आमों पर बौर आने शुरू हो गए हैं। कोयलों का स्वर संधान आहट देने लगा है। सब कुछ गुलाबी गुलाबी सा है । फरवरी फरफरा रही है । मटर की मुठ्ठी कस रही है। घरैतिन घुघनी बना रही है। चाय में भी मदिर मदिर मामला सांस ले रहा है। अंशु की कविता याद आ रही है, जिसमें वो कहता है
जाने क्या होता है
उन उंगलियों की मादक छुवन में 
कि चाय शराब के आगे खड़ी हो जाती है ।
ऐसा ही कुछ है। कविवर नीरज की आवाज़ कहीं से गूंज रही है
शोखियों में घोला जाए फूलों का शवाब
उसमें फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब
होगा वो नशा जो तैयार, वो प्यार है।
वसन्त प्यार का ही मौसम है। भर मुंह कहता है, जो प्यार पा जाए उसका भी भला, जो न पाए उसका भी भला। उसका काम तो प्यार बांटना है, वह तो प्रेम का अग्रदूत है
ऐ इश्क़ कहीं ले चल, ये दैरो हरम छूटें 
इन दोनों मकानों में झगड़ा नज़र आता है।
तभी तो कविता के किसान कैलाश गौतम को कहना पड़ता है
लगे फूंकने कान में, बौर गुलाबी शंख
कैसे रहें क़िताब में, हम मयूर के पंख।।
वसंत की कोई भी बात बिना निराला के कैसे पूरी हो सकती है, वह तो हिन्दी कविता के वसन्त हैं। महाप्राण निराला वसन्त पंचमी पर ही अपना जन्मदिन मनाते थे। हमारा शहर इलाहाबाद उनका जन्मदिन भी मनाने जा रहा है। उनकी रची सरस्वती वंदना में गंगा यमुना के बीच लुप्त हुई सरस्वती उजागर होने जा रही है, स्वर फूट रहे हैं 
वर दे वीणावादिनि 
वर दे
प्रिय स्वतंत्र रव,अमृत मंत्र नव
भारत में भर दे
वर दे! वीणावादिनि वर दे!!


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

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