फ़िरदौस ख़ान
अनंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित समकालीन गीतिकाव्य : संवेदना और शिल्प में लेखक डॉ. रामसनेही लाल शर्मा यायावर ने हिन्दी काव्य में 70 के दशक के बाद हुए संवेदनात्मक और शैल्पिक परिवर्तनों की आहट को पहचानने की कोशिश की है. नवगीतकारों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उन्हें उतने समर्थ आलोचक नहीं मिले, जितने कविता को मिले हैं. दरअसल, समकालीन आद्यावधि गीत पर काम करने का ख़तरा तो बहुत कम लोग उठाना चाहते हैं. डॉ. यायावर साढ़े तीन दशकों से भी ज़्यादा वक़्त से गीत सृजन का कार्य ब ख़ूबी कर रहे हैं. उन्होंने अपने वक़्त के गीति काव्य के परिवर्तनों को अच्छी तरह देखा और परखा है. इसलिए वह गीति काव्य के संवेदनात्मक और शिल्प में हुए बदलाव को बेहतर तरीक़े से पेश कर सकते हैं. इस दौर में गीत ने अपने पंख संवेदना के असीमित आकाश में फैलाए. मूल्यों की टूटन, अस्तित्व का संकट, आस्थाहीन मानवीय स्थितियां, युद्धों की विभीषिकाएं, जीवनगत विसंगतियां, विषम परिस्थितियों में जूझती मानवीय जिजीविषा आदि युग बोध की सभी संवेदनाएं गीत में रूपायित हुई हैं. आधुनिक बोध की हर खुरदरी संवेदना को गीत ने अपने भीतर ढाल लिया है. इस अभिनव संवेदना-संसार को वाणी देने के लिए उसे नया शिल्प, नया कलेवर, अभिनव प्रतीक-योजना और नया बिम्ब-विधान अपनाना पड़ा है. भाषा में विचलनपरक प्रयोग बढ़े हैं.

 

गीत रूमानी अनुभूतियों का प्रकाशन है, उसमें लिजलिजी भावुकता है, उसमें वर्तमान काल की उत्तप्त रश्मियों का ताप झेलने का सामर्थ्य नहीं है. हिन्दी गीत ने ऐसे आरोपों का बीसवीं सदी के छठे दशक से ही रचनात्मक उत्तर देना शुरू कर दिया था. डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ख़ुद एक समर्थ गीतकार हैं. इस ग्रंथ के अलावा उनकी कई कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें मन-पलाशवन और दहकती संध्या (गीत-ग़ज़ल), गलियारे गंध के (प्रणय परक नवगीत), पांखुरी-पांखुरी (मुक्तक), सीप में समन्दर (हिन्दी ग़ज़ल), मेले में यायावर (गीत), आंसू का अनुनाद (दोहा), अहिंसा परमो धर्म: (दोहा), अंधा हुआ समय का दर्पण (नवगीत संग्रह), संस्कृति और साहित्य संबंधों के अंत: सूत्र तथा जनक नए युग का जनक शामिल हैं. डॉ. यायावर को समकालीन गीतिकाव्य: संवेदना और शिल्प पर आगरा के डॉ. बीआरए विश्वविद्यालय ने डी लिट की उपाधि प्रदान की है. यह शोध प्रबंध अपनी परिधि में संपूर्ण गीति काव्य को पूरी समग्रता में समेटे हुए है. संवेदना और शिल्प के अंत: संबंध, गीति काव्य में संवेदना और शिल्प का स्वरूप, समकालीन गीति काव्य का स्वरूप, समकालीन गीत में लौकिक-अलौकिक संवेदनाएं, गीत की भाषा-संरचना एवं छंद विधान तथा शिल्प जैसे तत्वों पर गंभीर चिंतन करते हुए लेखक ने इस कृति को गीत पर सर्वांगपूर्ण समीक्षा का रूप दे दिया है. शोध ग्रंथ में सात अध्याय हैं. समकालीन गीत का कोई भी पक्ष लेखक की दृष्टि से छूटने नहीं पाया है. समकालीन जीवन की जटिलताएं, युगीन विसंगतियां, मूल्य-विघटन, युग बोध, प्रतीकों का स्वरूप, विषय-विधान और शिल्प के अन्य तत्व किस तरह बदले हैं और गीत ने काल की बदलती इच्छाओं, आकांक्षाओं के साथ किस तरह तालमेल बिठाया है, यह सब लेखक ने भलीभांति प्रस्तुत किया है. यह शोध प्रबंध समकालीन गीत को उन चिंताओं और अपेक्षाओं के अनुरूप पाता है, जो समकालीन हिन्दी कविता की चिंताएं और अपेक्षाएं हैं. यह गीत के संबंध में उठे तमाम सवालों का समाधान पेश करता है.

 

ग्रंथ में काव्य के विभिन्न रूपों को बहुत ही खूबसूरती के साथ पेश किया गया है. गीत का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि गीत किसी कथात्मकता का मोहताज नहीं होता. वह भाव केंद्रित होता है. उसकी गेयता संगीतमय भी होती है और संगीत रहित भी. वह प्रसंग निरपेक्ष स्वत: पूर्ण, भाव प्रवण, टेक आधारित, वैयक्तिक, युगीन यथार्थ से प्रभावित तथा अनेक उपरूपों में बुना हुआ होता है. गीति में संगीत, अनुभूति और रस का संगम रहता है. यह एक व्यापक अवधारणा है, जिसमें गीत, अनुगीत, समगीत, प्रगीत, गीतिका, अगीत आदि समाये होते हैं. कुछ विद्वानों ने गीति और गीत को एक मानकर भ्रमात्मकता उपन्न कर दी है. गीत के विषय आधारित कई भेद हैं-खुसरू शैली के गीत, रहस्यवादी शांत रस के गीत, सगुण, सगुण शक्ति के श्रृंगार परक गीत, वीर रस के गीत, करुणासिक्त गीत, देश प्रेम के गीत, छायावादी रहस्यवाद के गीत, निराशा, हीनता, क्षणभंगुरता के गीत, प्रगतिशील गीत, स्वातंत्र्य विजयोल्लास के गीत, युद्ध गीत आदि. गीत की जीवन में व्याप्ति सर्वाधिक है. अनेक अवरोधों के बाद भी गीत आज तक अपनी चमक दिखा रहा है. गीत अपने आप को सुनाने के लिए भी होता है. यह मुक्त छंद की तरह विस्तारवादी नहीं होता. गीत का श्रृंगार है-शालीनता और संक्षिप्तता. ध्रुव पद पर कड़ियों का आधारित होना इसकी रचना की विशेषता है.

 

शब्दकोश में प्रगीत का अर्थ है गीति काव्य. नाम के नयेपन की ललक में कुछ लोग गीत को प्रगीत कहते हैं. गीत से नवगीत ने जो अभिव्यक्ति परक भिन्नता अर्जित की है, वह प्रगीत ने नहीं की. नवगीत के कई रचनाकार टाइप्ड प्रतीत होते हैं, प्रगीतकारों में यह स्थिति नहीं है. भ्रमवश गीत और प्रगीत में अंतर नहीं माना जाता. प्रगीत में लयात्मकता शब्दों से आती है और इसमें वाद्यों के बिना ही संगीत फूटता है. प्रगीत में सौंदर्य शब्दों के विविध तत्वों से आता है, जबकि गीत में यह संगीत की शास्त्रीयता से पैदा होता है. सांस्कृतिक प्रगीत और नवगीत परस्पर विरोधी धाराएं हैं. प्रगीत गीत के जितना क़रीब है, उतना नवगीत के नहीं. प्रगीत युग बोध पर आत्मानुभूति और वैयक्तिकता को वरीयता देता है. प्रगीत में आशावाद और राष्ट्रीय तथा सांस्कृतिक चेतना का सौंदर्य होता है. वह टेक, अंतरा आदि का कट्‌टर अनुयायी नहीं होता. अनुगीत के समर्थकों का कोई वर्ग नहीं बना है. कलेवर और संरचना की दृष्टि से यह ग़ज़ल के क़रीब है. ग़ज़ल से इसकी भिन्नता यही है कि यह एक भाव पर केंद्रित होता है, जबकि ग़ज़ल की द्विपदियों के लिए यह ज़रूरी नहीं है. नवगीत गीतिकाव्य की सर्वाधिक चर्चित विधा है. नवगीत ने वैयक्तिक एवं रागात्मक प्रसंगों के आकाश को चीरकर लोक चेतना को कथ्य का केंद्र बनाया.

 

बक़ौल लेखक, समकालीन गीति काव्य में संवेदना और शिल्प की भूमिका सर्वोपरि है. संवेदना हमारे मन की चेतना की वह कूटस्थ अवस्था है, जिसमें हमें विश्व की वस्तु विशेष का बोध न होकर उसके गुणों का बोध होता है. काव्य में संवेदना करुण भावों को अधिक महत्व देती है. संवेदना युक्त कविता कृष्ण की बांसुरी जैसी है, जिसमें समाज का दिल और दर्द बजता है. संवेदना का जागृत होना व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर नहीं होता. कोशीय धरातल पर संवेदना के तीन भेद हैं. पहला विशिष्ट संवेदना, दूसरा अंतरावयव संवेदना और तीसरा स्नायविक संवेदना. संवेदना कविता का प्राण है. संवेदना के त्रिआयामी सिद्धांत से तनाव-शिथिलता, उत्तेजना- तथा सुख-वेदना में परिवर्तनशील है. समाज की क्रांतिकारी स्थितियां संवेदना को आंदोलित करती हैं तथा इतिहास को मो़ड देती हैं. चेतना के तीनों स्तर, एन्द्रिक, सांवेगिक और बौद्घिक संवेदना को मुखरित करते हैं. एको रस: करुण एव निमित भेदात के अनुसार, रस एक ही है-करुण. यह संवेदना का प्रमाणीकरण है. कवि की संवेदना का धरातल वैयक्तिक नहीं होता. युग परिवर्तन हो जाने से संवेदना नहीं बदलती. सामान्य भाषा संवेदना को काव्य भाषा के समान रूपायित नहीं कर पाती. संवेदना और अनुभूति का उद्‌गम स्थल मानव मन है. शैल्पिक उपादान संवेदना के प्रक्षेपण का कार्य करते हैं.

 

इस शोध ग्रंथ में लेखक ने 252 हिन्दी, एक दर्जन अंग्रेजी, 20 संस्कृत, 22 कोशों और 53 पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से प्रस्तुत तथ्यों को प्रमाणित किया है. संदर्भ ग्रंथों की सूची लेखक के विराट अध्ययन का प्रमाण है. ग्रंथ की भाषा परिमार्जित और आलोच्य विषय को स्पष्ट करने में पूर्ण समर्थ है. बहरहाल, यह कृति गीत समीक्षा के लिए आलोक स्तंभ साबित होगी. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)


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