जिन दिनों
जिन दिनों कुछ नहीं होता हमारे पास
निःशस्त्र होते हैं एक हारे हुए योद्धा से
उन दिनों भी बची होती है एक झीनी से उम्मीद बदलाव की
जिन दिनों बहुत लंबे और थकाऊ होते हैं रास्ते
पग पग पर बैठे होते हैं फ़िकरे कसने वाले
राह में होते हैं लोभ भरे आमंत्रण
बहला रही होती हैं मायावी विकास योजनाएं
उन दिनों भी एक विवेक बचा होता है
समझदारी भरी छांव का
जिन दिनों नहीं पूछता कोई हाल चाल आपका
व्यवस्था भी हाशिये पर डाल देती है नाकारा समझ
परिचित भी नहीं देते भाव
अवसर भी निकल जाते हैं कन्नी काट
उन दिनों गहता है कोई आपका हाथ
चलता है दूर तक साथ
शायद इसी को जिजीविषा कहते हैं
जब सामने होता है आपका नैराश्य
बार बार कोंचता है एकाकीपन
छुड़ाने लगती हैं मुस्कानें अपनी उँगलियाँ
छिटकने लगते हैं हौंसले मुट्ठियों से
तो किसी का प्यार भरा काँधे पर हाथ
या आत्मा से दिया हुआ आशीर्वाद
देता है अनंत प्रकाश
अपार ऊर्जा
फिर चल देता है बटोही
ओढ़ कर नई कामरिया सफ़र की ओर
-डॉ. अतुल चतुर्वेदी
