डॉ. फ़िरदौस ख़ान 
बक़रीद और बक़र ईद का असल नाम ईद उल अज़हा है. ये मुसलमानों का ईद उल फ़ित्र के बाद दूसरा बड़ा त्यौहार है. ईद उल अज़हा हिजरी महीने ज़िल हिज्जा की दस तारीख़ से शुरू होती है और 12 तारीख़ को ख़त्म होती है. इस त्यौहार का ताल्लुक़ अल्लाह के नबी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से है. जिस दिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से अपने बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम को क़ुर्बान किया था, उसी दिन की याद में ईद उल अज़हा मनाई जाती है.  
  
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “फिर जब इस्माईल अलैहिस्सलाम अपने वालिद के साथ दौड़ धूप यानी काम करने के क़ाबिल हो गए, तो इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ मेरे बेटे ! मैंने ख़्वाब में देखा है कि अल्लाह के हुक्म से मैं तुम्हें ज़िबह कर रहा हूं. इस बारे में तुम्हारा क्या ख़्याल है. इस्माईल अलैहिस्सलाम ने कहा कि अब्बा ! आप वह काम फ़ौरन करें, जिसका आपको हुक्म हुआ है. अगर अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे सब्र करने वालों में से पाएंगे. फिर जब दोनों ने अल्लाह का हुक्म मान लिया, तो उन्होंने बेटे को पेशानी के बल लिटा दिया. और हमने उन्हें आवाज़ देकर कहा कि ऐ इब्राहीम अलैहिस्सलाम ! वाक़ई तुमने ख़्वाब को सच कर दिखाया. बेशक हम मोहसिनों को इसी तरह जज़ा दिया करते हैं. बेशक यह बहुत बड़ी सरीह आज़माइश थी. और हमने एक बड़ी क़ुर्बानी के साथ इसका फ़िदया दिया. यानी इब्राहीम अलैहिस्सलाम के हाथ से इस्माईल अलैहिस्सलाम की जगह एक मेंढे को ज़िबह करवा दिया. और हमने उनके बाद आने वाले लोगों में उनका ज़िक्रे ख़ैर बाक़ी रखा. सलाम हो इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर. हम मोहसिनों को इसी तरह जज़ा दिया करते हैं. बेशक वे हमारे मोमिन बन्दों में से थे.
(37:102-111)
  
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक शख़्स से फ़रमाया कि मुझे क़ुर्बानियों वाले दिन को ईद मनाने का हुक्म दिया गया है, जिसे अल्लाह तआला ने इस उम्मत के लिए मुक़र्रर फ़रमाया है. 
(सुनन निसाई)
  
क़ुरआन मुकम्मल हुआ  
क़ुरआन करीम माहे रमज़ान के मुबारक महीने में नाज़िल होना शुरू हुआ था. अल्लाह तआला ने अपने आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ु़रआन नाज़िल किया था. हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास अल्लाह के पैग़ाम लाया करते थे. बाद में इन्हीं पैग़ामों यानी आयतों का ज़ख़ीरा क़ुरआन बना. क़ुरआन करीम 23 साल में नाज़िल हुआ. ये हज के दिनों में मुकम्मल हुआ. इसके साथ ही आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अल्लाह के हुक्म से दीन-ए-इस्लाम के मुकम्मल होने का ऐलान कर दिया.  
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “आज हमने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेअमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए दीन के तौर पर इस्लाम को पसंद किया है.” 
(5:3)

ईद उल अज़हा पर लोग अपने चौपायों की क़ुर्बानी करते हैं. बहुत से लोग क़ुर्बानी नहीं करते. इस बारे में उनकी अपनी ज़ाती मसलहतें होती हैं, जैसे माली हालत ठीक न होना वग़ैरह. 

ईद उल अज़हा की क़ुर्बानी के बारे में आलिमों की मुख़्तलिफ़ राय हैं. कुछ आलिम कहते हैं कि ईद उल अज़हा की क़ुर्बानी वाजिब है. कुछ आलिम मानते हैं कि ये सुन्नत है. कुछ लोग कहते हैं कि बिना हज के क़ुर्बानी का क्या मतलब है. 

हदीसों के मुताबिक़ अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बिना हज के पाबन्दी से क़ुर्बानी किया करते थे. उनके सहाबा भी क़ुर्बानी करते थे. 

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर फ़रमाते हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दस साल मदीने में रहे और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हर साल क़ुर्बानी किया करते थे.
(मुसनद अहमद, सुन्न तिर्मज़ी)

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो मैंढों की क़ुर्बानी किया करते थे और मैं भी दो मैंढों की ही क़ुर्बानी किया करता था.
(सही बुख़ारी)

ईद उल अज़हा पर क़ुर्बानी करना सुन्नत है. अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जिसने भी ईद की नमाज़ के बाद चौपाया ज़िबह किया उसकी क़ुर्बानी हो गई और उसने मुसलमानों की सुन्नत पर अमल कर लिया.”
(सही बुख़ारी)

क़ुर्बानी की क़दीमी रिवायत 
क़ाबिले ग़ौर है कि अल्लाह के पहले नबी हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के वक़्त से ही क़ुर्बानी की रिवायत है.
क़ुरआन करीम में हज़रत आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम के दो बेटों क़ाबील और हाबील का ज़िक्र है. हालांकि उनकी बहुत सी औलादें थीं. लेकिन यहां दो का ही ज़िक्र किया जा रहा है. क़ाबील अकुलीमा नाम की लड़की से शादी करना चाहता था, लेकिन उसके वालिदैन अपने छोटे बेटे हाबील से उसका निकाह करवाना चाहते थे, क्योंकि वह बहुत नेक और फ़रमाबरदार था. इस वजह से वह अपने वालिदैन और भाई का दुश्मन बन गया. 
अल्लाह तआला ने हुक्म दिया कि तुम दोनों क़ुर्बानी करके पहाड़ पर रख आओ, जिसकी क़ुर्बानी बारगाहे-इलाही में क़ुबूल होगी, उसी से अकुलीमा की शादी की जाएगी.

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “ ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उन लोगों से आदम अलैहिस्सलाम के दो बेटों हाबील और क़ाबील का सच्चा क़िस्सा बयान करो कि जब उन दोनों ने अल्लाह की बारगाह में एक-एक क़ुर्बानी पेश की, तो उनमें से एक हाबील की क़ुर्बानी क़ुबूल कर ली गई और दूसरी क़ाबील की क़ुर्बानी क़ुबूल नहीं की गई, तो हसद में जलते हुए वह हाबील से कहने लगा कि मैं तुझे ज़रूर क़त्ल कर दूंगा. हाबील ने जवाब देते हुए कहा कि बेशक अल्लाह परहेज़गारों से ही नियाज़ क़ुबूल करता है.
(5:27)

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ ईद उल अज़हा पर ही क़ुर्बानी करके जानवरों का ख़ून बहाया जाता है. दरअसल रोज़मर्राह की ज़िन्दगी में भी गोश्त के लिए लाखों करोड़ों जानवरों को ज़िबह किया जाता है. ये सिलसिला पहले ज़माने से ही चला आ रहा है. इसके अलावा कुछ मज़हबों में बलि का ज़िक्र मिलता है. मुशरिक अपने देवी-देवताओं को ख़ुश करने के लिए बलि दिया करते थे. उनका मानना था कि देवी-देवता ख़ून पीते हैं. बहुत सी जगह आज भी ऐसा होता है. 

लेकिन ईद उल अज़हा पर होने वाली क़ुर्बानी का ताल्लुक़ इंसान की नीयत से है. इसका ताल्लुक़ इस बात से है कि जिस फ़रमाबरदारी और ख़ुशी से वह अपना जानवर क़ुर्बान कर रहा है, क्या वह अल्लाह की ख़ुशी के लिए, उसकी मख़लूक़ की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जान भी क़ुर्बान कर सकता है.  

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और हमने हर उम्मत के लिए क़ुर्बानी मुक़र्रर कर दी है, ताकि वे उन चौपायों को ज़िबह करते वक़्त अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें अता किए हैं. लिहाज़ा तुम्हारा माबूद माबूदे यकता है. फिर तुम उसी के फ़रमाबरदार बन जाओ.” 
(22:34)

दरअसल क़ुर्बानी के ज़रिये अल्लाह अपने बन्दे की नीयत को ज़ाहिर करना चाहता है, क्योंकि अल्लाह तो सबकुछ जानने वाला है. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “अल्लाह को न क़ुर्बानी का गोश्त पहुंचता है और न उसका ख़ून. लेकिन अल्लाह की बारगाह में तुम्हारा तक़वा पहुंचता है. अल्लाह ने चौपायों को इसलिए तुम्हारे क़ाबू में किया है, ताकि तुम उन्हें ज़िबह करते वक़्त अल्लाह की तकबीर कहो, जैसे उसने तुम्हें हिदायत दी है.”
(22:37)

ईद उल अज़हा का त्यौहार न सिर्फ़ हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी की याद दिलाता है, बल्कि ये हमें ईमान के रास्ते पर चलने की तरग़ीब भी देता है. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने तौहीद के मामले में, ईमान के मामले में अपने मुंह बोले वालिद यानी अपनी परवरिश करने वाले अपने चाचा आज़र की पैरवी करने से साफ़ इनकार कर दिया था.   
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “बेशक सब लोगों से ज़्यादा इब्राहीम अलैहिस्सलाम के क़रीब वे लोग हैं, जिन्होंने उनके दीन की पैरवी की है और वही नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और उन पर ईमान लाए हैं. और अल्लाह मोमिनों का कारसाज़ है.”
(3:68) 

अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को तरह-तरह से आज़माया और वे हर आज़माइश में कामयाब रहे. क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम को उनके परवरदिगार ने चन्द बातों में आज़माया, तो उन्होंने उन सबको पूरा कर दिया. अल्लाह ने फ़रमाया कि हम तुम्हें लोगों का इमाम बनाने वाले हैं. इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि क्या मेरी औलाद में से भी ? अल्लाह ने फ़रमाया कि हां, लेकिन हमारा यह वादा ज़ालिमों तक नहीं पहुंचता.” 
(2:124)

यानी जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों की पैरवी करते हैं, वही दोनों जहां में कामयाबी हासिल करने वाले हैं. लेकिन दूसरों पर ज़ुल्म करने वाले लोग अपने दोनों जहां बर्बाद कर लेते हैं. दुनिया में भी उनके लिए रुसवाई है और आख़िरत में तो उनके लिए अज़ाब है ही.    
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “अल्लाह किसी को उसकी ताक़त से ज़्यादा तकलीफ़ नहीं देता. जिसने नेकी कमाई, तो अपने फ़ायदे के लिए ही कमाई और जिसने गुनाह किया, तो उसका वबाल उसी पर होगा.”
(2:286)

ईद उल अज़हा पर क़ुर्बानी करना सिर्फ़ एक सुन्नत है. जो इस्लाम के पैरोकार है, उनके लिए ताउम्र अल्लाह के  रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत पर अमल करना लाज़िमी है. 
क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “रसूल उस सब पर ईमान रखते हैं, जो उन पर उनके परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल किया गया और उनके साथ मोमिन भी. सब अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों पर ईमान रखते हैं. वे कहते हैं कि हम अल्लाह के रसूलों के दरम्यान किसी तरह का फ़र्क़ नहीं करते और हमने तेरा हुक्म सुना और इताअत क़ुबूल की. ऐ हमारे परवरदिगार ! हम तुझसे मग़फ़िरत चाहते हैं और हमें तेरी तरफ़ ही लौटना है. 
(2:285)

बेशक ईद उल अज़हा का त्यौहार हमें तौहीद पर क़ायम रहने और अल्लाह की राह में अपना माल व दौलत और जान तक क़ुर्बान कर देने का दर्स देता है.  
(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)
साभार आवाज़ 


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
I Love Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam

फ़िरदौस ख़ान का फ़हम अल क़ुरआन पढ़ने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें

या हुसैन

या हुसैन

फ़िरदौस ख़ान की क़लम से

Star Web Media

सत्तार अहमद ख़ान

सत्तार अहमद ख़ान
संस्थापक- स्टार न्यूज़ एजेंसी

ई-अख़बार पढ़ें

ब्लॉग

एक झलक

Followers

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

साभार

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं