मलिक असगर हाशमी
आंध्र प्रदेश के पिछड़े मुसलमानों को नौकरी और तालीमी इदारे के दाखिले में चार प्रतिशत आरक्षण देने के हक में सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या आया, उर्दू मीडिया को लगने लगा है मुस्लिमों की पुरानी मांगें पूरी होने के दिन करीब आ गए हैं। अब तक धर्म के आधार पर और मुसलमानों में जाति प्रथा नहीं होने की दलील देकर उन्हें आरक्षण से दूर रखा जाता रहा है, जबकि मुख्य न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ की टिप्पणी ने ऐसी तमाम दलीलें खारिज कर दी हैं।

‘सियासत’ ने अपने संपादकीय में इसे ऐतिहासिक और दूरगामी परिणाम वाला फैसला बताया है। जो समझते हैं मुस्लिमों में जाति प्रथा नहीं है, उन्हें इल्म नहीं कि सिर्फ दिखावे को मस्जिदों में एक कतार में बंदा और बंदानवाज खड़े होते हैं। वर्ना हालत बेहद बुरी है। नौबत यह है कि दो अलग जातियों में शादी करने वाले को फौरन आपत्तिजनक लफ्ज ‘मुलेजादा’ से नवाज दिया जाता है। बिहार और यूपी में यह बुराई कुछ ज्यादा ही है। तीन सदस्यीय खंडपीठ ने यह जताने की कोशिश की है कि हिंदुओं की तरह मुसलमानों में भी मेहतर, हज्जम, फकीर, धोबी, जुलाहे जैसी जातियां हैं, इसलिए उन्हें भी उनका हक मिलना चाहिए।

अखबारों को लगता है पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण दिए बगैर उद्धार संभव नहीं। सच्चर कमीशन और रंगनाथ मिश्र रिपोर्ट भी इसकी वकालत करती हैं। उर्दू अखबारों का आरोप है पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण देने में केंद्र दिलचस्पी नहीं दिखा रहा। लोकसभा में रंगनाथ मिश्र रिपोर्ट पेश करने पर भी मुस्लिम कोटा तय नहीं किया जा सका है। एक अखबार कहता है- कांग्रेस ने 2009 के चुनाव में पसमंदा मुसलमानों को आरक्षण देने का वादा किया था। केंद्र में सरकार बनने के बाद भी इसे पूरा करने में इसलिए दिलचस्पी नहीं दिखाई जा रही कि कहीं हिंदू वोट बैंक बिदक न जाए। वर्ना क्या वजह है कि महिला आरक्षण बिल को लेकर आक्रामक रुख दिखाने वाली यह पार्टी इस मुद्दे पर खामोशी अख्तियार किए हुए है। अखबारों ने जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन की उस टिप्पणी को खासी अहमियत दी है जिसमें उन्होंने कहा है-‘सिर्फ इसलिए कि मुसलमान हैं उन्हें आरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता। सवाल हिंदू या मुसलमान का नहीं है। सवाल है सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन का।’

‘ऐतमाद’ अपने संपादकीय में कहता है कि संजीदगी से किसी काम को किया जाए तो अंत सुखद होता है। इत्तेहाद-ए-मुस्लिमीन के सदर तथा सांसद सलाहउद्दीन ओवैसी कोर्ट के फैसले को बड़ी कामयाबी बताते हैं। उनका कहना है इसमें मुखतलिफ मुस्लिम तंजीमों, जमायतों ने आंध्र सरकार की भरपूर मदद की है। ‘हमारा समाज’ ने ‘मुसमलानों के लिए रिजर्वेशन की राह हमवार’ में सवाल उठाया है कि हिंदू जाति के धोबी, नाई को आरक्षण का लाभ मिल सकता है तो इन कामों को करने वाले मुसलमान इससे वंचित क्यों हैं? उन्हें जब भी पिछड़ों में शामिल करने की वकालत की जाती है, हर बार संविधान के आर्टिकल 341(3)(ए) का हवाला देकर धर्म के आधार पर आरक्षण देने से मना कर दिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही इसकी मुखालफत करने वाली भाजपा की त्यौरियां फिर चढ़ गई हैं। इसके प्रवक्ता तरुण विजय कहते हैं फैसले का नतीजा देश हित में नहीं है। ‘मुंसिफ’ ने आंध्र के मुख्यमंत्री रोसैया की तारीफ करते हुए कहा है संविधान के नाम पर इस साल फरवरी में आंध्र हाई कोर्ट ने सरकार के मुसलमानों को आरक्षण देने के फैसले पर रोक लगा दी थी। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। हक दिलाने का प्रयास करते रहे। लखनऊ से प्रकाशित ‘अवधनामा’ कहता है-आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने मुस्लिम आरक्षण को एक तरह से गैरकानूनी करार दे दिया था। यहां तक कि अदालत ने इस मामले में ओबी कमीशन के पिछड़े मुस्लिम समूह की निशानदेही को भी दरकिनार कर दिया। अखबारों ने कानून मंत्री वीरप्पा मोइली के कोर्ट का फैसला आने के बाद दी गई प्रतिक्रिया को भी प्रमुखता दी है। मोइली का कहना है राज्य के बहुत सारे नौजवान परेशान थे। सरकार भी नियुक्तियों को लेकर दिक्कत में थी।

अखबार कहते हैं कठिनाई अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। फैसला अंतरिम होने के चलते आंध्र प्रदेश सरकार को अगस्त में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखना होगा। ‘इंकलाब’ कहता है इसके लिए सरकार को तमाम अहम कानूनी कदम उठाने होंगे। ‘सहाफत’ में रोसैया ने यकीन दिलाया है वे पीठ के सामने संजीदगी से सरकार का पहलू रखेंगे। ‘औरंगाबाद टाइम्स’ कहता है-जब दूसरे तबके को छियालीस प्रतिशत आरक्षण मिल सकता है तो चार प्रतिशत मुस्लिमों का कोटा फिक्स करने में क्या दुश्वारी है?
(लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं)


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