मलिक असगर हाशमी 
दंतेवाड़ा के जंगलों में नक्सलियों के सीआरपीएफ जवानों के खून से होली खेलने पर उर्दू अखबार बेहद विचलित हैं। उन्हें लगता है जब माओवादियों को आतंकियों से ज्यादा गंभीर और बड़ा खतरा बताया जा रहा है, तो फिर उनके सफाए में क्यों ढुलमुल नीति अपनाई जा रही है। इन कारणों से ही बड़ी तादाद में सुरक्षा बलों के जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी। सैयद अतहर अली लिखते हैं-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री नक्सलियों को मुल्क के लिए नासूर मानते हैं। इसके इतर खुफिया एजेंसियां और सेनाएं लश्कर, हेडली और हाफिज सईद के नाम पर हाय-तौबा मचाए रहती हैं। अमेरिका ने आतंकवाद के नाम पर इराक और अफगानिस्तान को तबाह कर डाला। अब अपने देश में आतंकी तंजीमों के नाम पर बेवजह लोगों में दहशत पैदा करने की कोशिश की जा रही है। ‘इंकलाब’, ‘नक्सली दहशत कब तक?’ में कहता है-गृह सचिव गोपाल कृष्ण ने माओवादियों के 2050 तक दिल्ली की हुकूमत पर काबिज होने के खौफनाक मंसूबे का खुलासा किया है। यह सच है तो उनके खिलाफ फौजी कार्रवाई करने में झिझकना चाहिए? कश्मीर में फौजी कार्रवाई हो सकती है, तो छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं?
अखबारों को लगता है कि मसले को गंभीरता से लेने की बजाय इसे सियासी रंग देने की ज्यादा कोशिशें होती रही हैं। आज तक नक्सलवाद के पनपने के कारणों का पता लगाकर उसे निपटाने की गंभीर पहल नहीं की गई। इसकी जगह सियासी दल उनका समय-समय पर राजनैतिक फायदा उठाते रहे हैं। बिहार के बारा नरसंहार के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद पर एमसीसी नेता विजय कुमार आर्य के साथ एक ही कार में घूमने का आरोप लग चुका है। एक केंद्रीय मंत्री पर लालगढ़ में माओवादियों को हवा देने का इल्जाम है। तेलंगाना राज्य की मांग को सुलगाए रखने में माओवादियों से मदद ली जा रही है। झारखंड के चतरा के जंगलों में जब सेना ने फील्ड फायरिंग रेंज स्थापित करने का निर्णय लिया तो तब के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडिस ने मना कर दिया था। इल्जाम है कि उनके दल से बड़ी संख्या में जुड़े एक जाति विशेष के लोग उस इलाके में नक्सलियों के समर्थक हैं। उस इलाके से आने वाले बिहार विधानसभा के एक मान्य सदस्य पर नक्सलियों से रिश्ता रखने का आरोप है। चतरा के मुसलमान नक्सलियों के निशाने पर रहे हैं। उर्दू अखबार पी. चिदंबरम के लालगढ़ के दौरे में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री को नसीहत देने को भी राजनीतिक चश्मे से देखते हैं।
‘नक्सली कहर’ ,‘यह मामूली हमला नहीं था’, ‘नक्सली तहरीक ऐसे खत्म नहीं होगी’, ‘ग्रीन हंट का जवाब रेडहंटर’, ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट लहूलुहान’, ‘ये दो दिन में क्या माजरा हो गया’ वगैरह शीर्षक से छपे लेख और संपादकीय में अखबारों ने नक्सलियों के फैलते जाल और उनके बुलंद हौसले के प्रति चिंता जताई है। इस वक्त देश के करीब बीस राज्यों के 223 जिले नक्सल प्रभावित हैं। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है पिछले पांच वर्षो में सुरक्षा बलों के 1094 जवान नक्सलियों का शिकार बने हैं। छत्तीसगढ़ के सोलह जिलों में माओवादियों की समानांतर सरकार चलती है। ‘हमारा समाज’ कहता है नक्सलियों के पास आधुनिक असलहों का जखीरा है। वे वर्षों से गुरिल्ला युद्ध का अभ्यास कर रहे हैं। ऐसे में उनसे निपटने के लिए मारक रणनीति बनानी होगी। मीडिया में नक्सलियों के सफाये के बारे में सार्वजनिक बयान देना उर्दू अखबारों को नहीं जंचा। गृहमंत्री के ऐसे बयान देने के अड़तालीस घंटे बाद ही 76 सीआरपीएफ के जवान शहीद कर दिए गए। ‘मुंसिफ’ ग्रीनहंट की गंभीरता पर सवाल उठाते हुए लिखता है-नक्सली हमले के बाद भी जवानों को मदद पहुंचाने में देरी की गई। ‘हमारा मकसद’ की राय में नक्सली किसी तहरीक से नहीं जुड़े हैं, बल्कि कातिलों का गिरोह है। उनके सफाए में देरी नादानी होगी। ‘अवधनामा’ कहता है पिछले चार दशकों से देश आतंकवाद और नक्सलवाद झेल रहा है फिर भी हम उन्हें काबू करने में असमर्थ हैं। ‘सियासत’ कहता है-हिन्दुस्तानी फौज को आतंकियों से ज्यादा नक्सलियों से निपटने की जरूरत है। ‘जदीद खबर’, ‘बरबरियत’ में कहता है-इस मसले पर देश के हुक्मरानों को रणनीति और सोच बदलनी होगी। ‘सहाफत’ का सुझाव है दंतेवाड़ा के हमले के लिए माओवादियों के पास संगीन और आधुनिक हथियारों का जखीरा कहां से आया? इसका पता लगाना बेहद जरूरी है। लगे हाथ उर्दू अखबार हिंदूवादी संगठनों को नसीहत देने में भी पीछे नहीं रहे। ईसाइयों और मुस्लिमों के खिलाफ हाथ आजमाने वालों को नक्सलियों से मुकाबला करने के लिए भी आगे आना चाहिए। अखबारों में मालेगांव धमाके के आरोपियों के आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बारे में आपत्तिजनक बातें कहने को प्रमुखता दी गई है।
(लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं)


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