इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य दिवस स्वास्थ्य पर शहरीकरण के प्रभाव विषय पर केंद्रित है। इस बार विश्व स्वास्थ्य संगठन ''1000 शहर-1000 जीवन'' अभियान लेकर आया है। यह अभियान स्वास्थ्य गतिविधियों के लिए सड़कों को खोलने के लिए शहरों के आह्वान के साथ दुनिया भर में आयोजित किया जाएगा। बाकी सभी की तरह यह विषय भारतीय संदर्भ में भी बहुत ज़रूरी माना जाता है जहां स्वास्थ्य मंत्री श्री गुलाम नबी आज़ाद कहते हैं, '' यद्यपि हम अपना आर्थिक सूचकांक सुधार रहे हैं, मगर फिर भी हम अब तक दुनिया में बीमारी का बोझ बढ़ाने के सबसे बड़े योगदानकर्ता बने हुए हैं। ''

अनुमान बहुत भयावह हैं। आज वयोवृध्द लोगों की आबादी बढ़ने तथा ज्यादा महत्त्वपूर्ण रूप से तेजी से हुए शहरीकरण के कारण असंक्रामक रोग (एनसीडी), विशेषरूप से कार्डियोवस्कुलर रोग (सीवीडी), डायबिटीज मेलिटस, कैंसर, आघात और जीर्ण फेफड़ा रोग प्रमुख स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में उभरे हैं। भारत में हुए सर्वेक्षणों से पता चलता है कि करीब 10 प्रतिशत वयस्क उच्च रक्त चाप से पीड़ित हैं। हृदयवाहिका यानी कार्डियोवस्कुलर रोगों में वृध्दि जारी है। भारत में अस्थानिक अरक्तता हृदय रोगों के कारण मृत्यु की संख्या 1990 में 12 लाख से बढ़कर वर्ष 2000 में 16 लाख तथा 2010 में 20 लाख होने का अनुमान है। जीवन के बेहद उत्पादक दौर में अपरिपक्व मातृ अस्वस्थता दर और मृत्यु दर भारतीय समाज और उसकी अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। अनुमान है कि वर्ष 2005 में भारत में हुई कुल मौतों (10,362,000) में एलसीडी का योगदान 5,466,000 (53 प्रतिशत) था। इस भयावह आंकड़े से शहर बहुत अधिक त्रस्त हैं। अगर उपचारात्मक उपाय नहीं किए गए तो भविष्य में भी कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। विश्व बैंक का अनुमान है कि 2035 तक शहर दुनिया भर में गरीबी के प्रधान स्थल बन जाएंगे। शहरी गरीबों की स्वास्थ्य समस्याओं में हिंसा, जीर्ण रोग, और टीबी एवं एचआईवी#एड्स जैसे संक्रामक रोगों के लिए जोखिम में वृध्दि शामिल है।

संकट से निपटना
भारत ने इस स्थिति पर ध्यान दिया है तथा स्थिति से निपटने के लिए ठोस शुरूआत की है। दस राज्यों के दस जिलों में (प्रत्येक में एक) मधुमेह, कार्डियो-वस्कुलर रोगों और आघात से बचाव एवं नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीसीडीएस) की प्रायोगिक परियोजना शुरू की गई है। ग्यारहवीं योजना में इसके लिए कुल योजना आबंटन 1620.5 करोड़ रुपए है। अन्य बातों के अलावा एनपीसीडीएस इस रोग के बारे में जल्दी पता लगाने की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए है। इस योजना के तहत पूरे देश को लाया जाएगा। स्वास्थ्य को प्रोत्साहन एनसीडी से बचाव और नियंत्रण का प्रमुख घटक है। इसमें समर्थक माहौल उपलब्ध कराने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप के साथ शैक्षिक गतिविधियां शामिल होनी चाहिए। यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि एनसीडी नियंत्रण के लिए स्वास्थ्य प्रोत्साहन सरल संदेश के साथ दिया जा सकता है अर्थात नमक एवं चीनी का कम इस्तेमाल, व्यायाम, तनाव से बचना, तंबाकू एवं अल्कोहल के सेवन से बचना तथा सब्जियों एवं फलों का इस्तेमाल बढ़ाना। इन आसान से उपायों से एनसीडी से बचाव किया जा सकता है या इसे ज्यादा देर तक टाला जा सकता है।
असंक्रामक रोगों के क्षेत्र में अनेक पहल की गई हैं अर्थात राष्ट्र्र्रीय बधिरता नियंत्रण कार्यक्रम, राष्ट्रीय वयोवृध्द स्वास्थ्य देखरेख कार्यक्रम, राष्ट्रीय मौखिक स्वास्थ्य कार्यक्रम। अनुमान है कि हमारी सड़कों पर रोजाना 275 व्यक्ति मरते हैं तथा 4,100 घायल होते हैं। इस तथ्य के मद्देनज़र, स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजमार्ग सुश्रुत देखरेख परियोजना शुरू की जो अपनी तरह की महत्त्वाकांक्षी परियोजना है तथा इसके तहत सम्पूर्ण स्वर्णिम चतुर्भुज तथा उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम गलियारों को शामिल करने का इरादा है तथा इन्हें 200 अस्पताल, अस्पताल-पूर्व देखरेख इकाई तथा एकीकृत संचार प्रणाली के साथ उन्नत किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना बड़े पैमाने पर अछूती आबादी को स्वास्थ्य सेवाओं के दायरे में लाने की एक अन्य पहल है।

योजना ही कुंजी है
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, शहरीकरण सहज रूप में सकारात्मक या नकारात्मक नहीं होता है। निम्न घटक भी सामाजिक निर्धारकों के रूप में संदर्भित हैं- शहरी ठिकानों का अभिसरित होना जो स्वास्थ्य दशा और अन्य निष्कर्षों को बहुत ज्यादा प्रभावित करता है। इन निर्धारकों में भौतिक बुनियादी ढांचा, सामाजिक एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, स्थानीय शासन, और आमदनी एवं शैक्षिक अवसरों का वितरण शामिल हैं। एचआईवी/एड्स और टीबी जैसे संक्रामक रोग, हृदय रोग एवं मधुमेह, मानसिक विकार जैसे जीर्ण रोगों तथा हिंसा एवं सड़क यातायात दुर्घटनाओं के कारण हुई मृत्यु - सभी इन सामाजिक निर्धारकों से निर्देशित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शहरी केंद्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के संबंध में बढ़ती असमानता पर चिंता प्रकट की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का दृढ़ विश्वास है कि सक्रिय परिवहन, शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए निर्धारित क्षेत्रों में निवेश और तंबाकू पर नियंत्रण एवं खाद्य सुरक्षा के लिए कानून पारित करने के जरिए शहरी आयोजना स्वस्थ व्यवहारों एवं सुरक्षा को बढ़ावा दे सकती है। आवास, पानी एवं स्वच्छता के क्षेत्रों में शहरी जीवन दशाओं में सुधार करना स्वास्थ्य जोखिमों के उन्मूलन में बहुत मददगार होगा। ऐसे कार्यो के लिए अनिवार्य रूप से अतिरिक्त वित्त की ज़रूरत नहीं होगी लेकिन प्राथमिकता वाले कार्यक्रमों के लिए संसाधनों को पुननिर्देशित करने की प्रतिबध्दता की ज़रूरत होगी, इस प्रकार ज्यादा कार्यदक्षता हासिल की जा सकेगी।

शहरीकरण हमारे समय की वास्तविकता है, हम इसे सकारात्मक मानकर अनुक्रिया करें या नकारात्मक मानकर यह पूरी तरह हमारे ऊपर निर्भर है। इस संदर्भ में शहरीकरण नीति संबंधी चुनौती भी है और महत्त्वपूर्ण व्यक्तिगत विकल्प भी। स्वस्थ आदतों को आत्मसात करके तथा तत्काल खपत के बजाय संसाधनों को लंबे समय तक कायम रखने के प्रति चिंतित होकर ही समाज इस वास्तविकता का सामना ज्यादा सार्थक ढंग से कर सकता है।
पेशकश : असलम ख़ान


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