खिड़कियाँ बन्द हैं, और कोई दरीचा भी नहीं।
बहुत दिनों से, इस घर में कोई आया भी नहीं।।
बहुत दिनों से, इस घर में कोई आया भी नहीं।।
भटक रहा हूँ मैं, तपते हुये सहरा में अभी,
पाँव जलते हैं और,सर पे कोई साया भी नहीं।।
मैनें जो राह यह, पकड़ी है बहुत मुश्किल है
कोई हमराह नहीं, कोई नक्श-ए-पा भी नहीं।।
मैं सफ़र में हूँ और, अहद है चलते रहने का,
कहाँ पे जाना है,मंज़िल का कुछ पता भी नहीं।।
हरेक पड़ाव पे, बस नाम उस का लेता हूँ,
जो मेरे दिल में है,लेकिन मेरा हुआ भी नहीं।।
-कैलाश मनहर