राजेश कुमार गुप्ता 
फ़िल्मी दुनिया में सुर और संगीत में मंगेशकर घराने का अहम योगदान रहा है। इस घराने ने हमें लता, आशा, उषा, मीना व हृदयनाथ नाथ मंगेशकर जैसे अनमोल नगीने दिए। आज इसी घराने से मंगेशकर बहनों में बहुमुखी प्रतिभा की धनी 'उषा मंगेशकर' जी को उनके 90वें जन्मदिन (15 दिसंबर 1935) पर हार्दिक शुभकामनाएं ...
उषा जी मंगेशकर बहनों में सबसे छोटी और भाई हृदयनाथ मंगेशकर से बड़ी हैं। उनकी यादों में अपने माता-पिता की धुंधली यादें ही हैं, उनके पिता का निधन तभी हो गया था, जब वह मात्र छह वर्ष की थीं। इसलिए वे अपने पिता की संगीत-शिक्षा से महरूम रहीं। लेकिन संगीत और अन्य कलाओं के प्रति उनका झुकाव बचपन से रहा। वे बचपन से ही अपनी बड़ी बहनों (लता, मीना, आशा) के संगीत के प्रति लगाव से प्रभावित रहीं। बाद में उन्होंने उस्ताद अमानत अली ख़ान और उस्ताद अमन अली ख़ान से संगीत की औपचारिक शिक्षा भी प्राप्त की। वह अपने भाई-बहनों के साथ संगीत कार्यक्रमों में जाया करती थीं, जिससे उनकी गायन प्रतिभा और निखर उठी। शुरुआती वर्षों में, उनकी गायन शैली और कुछ हद तक उनकी आवाज़ भी लता मंगेशकर से बहुत मिलती-जुलती थी। 'अपलम चपलम ...' जैसे गीतों में उनकी आवाज़ों में अंतर करना बहुत मुश्किल है।

बाद में उन्होंने अपनी खुद की शैली विकसित की, गायिकी के साथ-साथ उन्हें चित्रकला (जो उन्होंने आर के स्टूडियो के कला निर्देशक श्री अचारेकर से सीखी) और नृत्य में भी रुचि थी। कहीं कहीं ये भी उल्लेख है कि पार्श्व गायिका के रूप में फ़िल्मों में आने से पहले उन्होंने नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण भी लिया था। उनकी चित्रकला प्रतिभा जगजाहिर है और कुछ साल पहले मुंबई में उनकी कुछ पेंटिंग्स की प्रदर्शनी भी लगी थी। उनके लिए, चित्रकला और गायन एक दूसरे के पूरक हैं और आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि, "जब हम कोई गीत सुनते हैं, तो हमें उसके फिल्मांकन के बारे में एक निश्चित छवि मिलती है। यह एक ऐसी छवि बनाती है जो गीत को सही भावों के साथ गाने में मदद करती है।" वह बचपन से ही पेंटिंग भी करती थीं, लेकिन उन्होंने पहली बार 'सुहाना सफर और ये मौसम हसीन ...' के गीत के लिए पेंटिंग की थी। इसे सुनने के बाद उन्होंने समुद्र तट का चित्र बनाया, लेकिन बाद में जब उन्होंने उसी गीत को जंगल में चित्रित होते देखा तो उन्हें निराशा हुई। उनके द्वारा बनाए गए 'शिवाजी गणेशन' और 'शिवाजी महाराज' के चित्र काफी प्रसिद्ध हैं।

उनका पहला पार्श्व गायन 1954 में आई, व्ही शांताराम की फ़िल्म 'सुबह का तारा' के लिए 'बेबी राजश्री' के लिए था। यह उनका पहला एकल गायन था और उनकी आवाज़ पर्दे पर खूब जमी। लेकिन ऐसा लगता है कि उन्होंने हिंदी फिल्मों में अपने गायन करियर को लेकर कभी गंभीरता नहीं दिखाई और न ही वे इसे लेकर ज्यादा सचेत भी रहीं। शुरुआती कुछ वर्षों में उन्होंने लता मंगेशकर के साथ युगल गीत गाए, जिनमें से कुछ बेहद हिट रहे। 'आज़ाद' फिल्म के युगल गीत इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं। उन्होंने शुरुआती वर्षों में बाल कलाकारों के लिए भी गाया। लंबे समय तक हिंदी फिल्मों में उनकी प्रतिभा को उतना बढ़ावा नहीं मिला। 60 के दशक में उन्होंने लता मंगेशकर और आशा भोसले के साथ कई युगल गीत गाए। लेकिन इनमें से अधिकांश गाने सहायक नृत्य-भाग थे, हालांकि कभी-कभी अगर लता मंगेशकर सह-गायिका होती थीं तो नायिका भी गाने का हिस्सा होती थीं। 60 के दशक में उन्हें मैजिक कार्पेट, मुजरिम कौन खूनी कौन, टार्ज़न और किंग कांग जैसी कुछ बी-ग्रेड और स्टंट फिल्मों में एकल पार्श्व गायन का मौका मिला। गाने औसत दर्जे के थे, हालांकि कुछ फिल्मों में अच्छे गाने भी थे। उन्होंने लोरी से लेकर कैबरे, प्रेम गीत, भावपूर्ण ग़ज़ल और मुजरा तक, हर तरह के गाने गाए। वह अपनी आवाज़ को परिस्थिति के अनुसार ढाल लेती थीं। उन्हें सबसे ज्यादा फ़िल्म 'जय संतोषी मां' के लिए जाना गया।

इसका एक दिलचस्प किस्सा है, दरअसल 'जय संतोषी मां' के संगीत निर्देशक 'सी अर्जुन' फ़िल्म के गाने लता जी से गवाना चाहते थे। इसके लिए जब वे लता जी के पास पंहुचे तो, फ़िल्म का नाम जानने के बाद लता जी ने उनसे कहा कि फ़िल्म के नाम के मुताबिक सभी गानों में 'ष' का उच्चारण बार बार आएगा, जो शायद मैं बेहतर उच्चारण न कर पाऊं, तो 'सी अर्जुन' जी ने कहा, तो फिर आशा जी से गवा लेते हैं। तो लता जी ने कहा, आशा के साथ भी यही दिक्कत आएगी। आप इन गानों को उषा से गवा लीजिए, क्योंकि जिसके ख़ुद के नाम में 'ष' का उच्चारण हो, वो इन गानों को बेहतर गा पाएगी। और फिर ... इस फ़िल्म के गानों ने इतिहास रच दिया।

जहां उन्हें भक्ति-गीत 'मैं तो आरती उतारू रे ...' के लिए सबसे ज़्यादा जाना जाता है, वहीं आइटम नंबर 'मुंगला' भी उनके लोकप्रिय गानों में से एक है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत सी. रामचंद्र के साथ की, लेकिन बाद में उन्होंने कई लोकप्रिय और कम लोकप्रिय संगीतकारों के साथ भी काम किया। मदन मोहन, जयदेव, शंकर जयकिशन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन, कल्याणजी आनंदजी उनके करियर के लोकप्रिय संगीतकारों में से थे। उन्होंने इकबाल कुरैशी, परदेसी, जी.एस. कोहली, चित्रगुप्त, रवि, सी. अर्जुन, बप्पी लाहिड़ी, राम लक्ष्मण आदि के साथ भी काम किया। फ़िल्म 'आरती' में गाये उनके गीत भी ख़ूब मशहूर हुए। उन्हें 'इंकार' फ़िल्म के 'मुगला' और 'इकरार' फ़िल्म के 'हमसे नजर तो मिलाओ ...' गीतों के लिए भी नामांकित किया गया। लेकिन वे कभी भी पुरस्कार नहीं जीत सकीं। उनके करियर पर नजर डालें तो ज्यादातर गाने युगल, तिकड़ी या चौगुनी गायकों के साथ हैं। उनके उत्कृष्ट और लोकप्रिय हिंदी एकल गीतों की संख्या बहुत ही कम है।उन्होंने हिंदी, मराठी व अन्य भाषाओं में पार्श्व-गायन दिया। पर उन्हें अपनी बहनों (लता जी व आशा जी) के समान वो अपेक्षित सफलता व मौके नहीं मिले।

उषा जी को लोक संगीत से बहुत लगाव रहा है। उन्होंने 60 साल से अधिक उम्र तक सिंगिंग की। उन्होंने 1992 में दूरदर्शन के लिए म्यूजिकल ड्रामा 'फूलवंती' को प्रोड्यूस किया था, जिसकी कहानी बाबा साहेब पुरंदरे पर आधारित थी।


أنا أحب محم صَلَّى ٱللّٰهُ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ

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