आजकल जीवन काफ़ी संघर्षों से भरा हुआ है। जो लोग संघर्ष करते हैं, वही आगे बढ़ते हैं। ऐसे में पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन के बाद भी कुछ लोग समाजसेवा एवं हिन्दी सेवा तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए समय निकाल ही लेते हैं। ऐसे लोग ही अपना नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखवाने की ओर अग्रसर होते हैं। इन्हीं नामों में एक नाम है लाल बिहारी लाल का, जो बिना शोर-शराबे के अपना लक्ष्य साधने में लगे हुए हैं। वे कवि, लेखक एवं पत्रकार हैं। फ़िलहाल वे साहित्य टीवी में सम्पादक के रूप में कार्यरत हैं।
लाल बिहारी लाल का जन्म बिहार के सारण ज़िले के श्रीरामपुर ग्राम में एक मध्यम वर्गीय़ शिक्षक परिवार में तृतीय संतान के रूप में 10 अक्टूबर 1974 को हुआ था। घऱ में शिक्षा का माहौल था और सामाजिक परिवेश में बचपन बीता।
वे कहते हैं- "पिता जी एक माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक थे और माता जी एक कुशल गृहणी थीं। तीन भाइयों में मैं सबसे छोटा हूँ। बड़े भाई भी शिक्षा विभाग बिहार सरकार में शिक्षक के पद पर थे। अब वो नहीं रहे। उनसे छोटे भाई स्टेट बैंक आँफ़ इंडिया में वरिष्ट प्रबंधक से 31 दिसंबर 2025 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं।"
वे कहते हैं- "पिता जी एक माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक थे और माता जी एक कुशल गृहणी थीं। तीन भाइयों में मैं सबसे छोटा हूँ। बड़े भाई भी शिक्षा विभाग बिहार सरकार में शिक्षक के पद पर थे। अब वो नहीं रहे। उनसे छोटे भाई स्टेट बैंक आँफ़ इंडिया में वरिष्ट प्रबंधक से 31 दिसंबर 2025 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं।"
अपनी शिक्षा के विषय में वे कहते हैं- "प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई औऱ बाक़ी शिक्षा दिल्ली से, तो कुछ पत्राचार से भी हुई। दिल्ली आने के बाद ज़िन्दगी से काफ़ी कुछ सीखा। जब तक आप दो पैसे कमा नहीं लेते, तब तक कोई रिश्ता-नाता आपकी मदद नहीं करेगा। काफ़ी संघर्ष और कोशिश के बाद और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, नई दिल्ली में 1995 के अंत में जाँब लग गई।"
अपने लिखने के शौक़ का ज़िक्र करते हुए वे कहते हैं- "जो औरो की बेवफ़ाई ग़मों का समंदर एवं उल्फ़त का पहाड़ लिए खडे हो जाते हैं, वही कवि या लेखक बन जाते हैं। दुखों का सामना तो हर कोई करता है। कोई हंस के सह लेता है, तो कोई रोकर, तो कोई सोच-विचार के आगे बढ़ता है। इसी का परिणाम है कि मैंने लेखनी को हाथ में पकड़ लिया और यह सिलसिला आज भी जारी है। इसी समय बिहार विश्वविद्यालय में भोजपुरी का पाठ्यक्रम तैयार हो रहा था, जिसकी अध्यक्षता डॉ. प्रभुनाथ बाबू कर रहे थे, उनको अपनी एक कविता क्रांति भेजी औऱ वो स्वीकृत हो गई, परन्तु यह मुझे सूचना 2016 में डॉ. संतोष पटेल जी से मिली। औऱ यही कविता क्रांति नालंदा विश्वविद्यालय के पत्राचार के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में भी शामिल है और विश्व कविता कोष में भी शामिल है।"
वे आगे कहते हैं- "स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं से शुरू होकर साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक तथा दैनिक पत्र पत्रिकाओं में अनवरत कविता, लघु कथा तथा समसामयिक एवं सामाजिक मुद्दों पर आलेख लगातार देश के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। दर्जनों साझा काव्य एवं लघु कथा संकलन में सहभागिता, 5 काव्य संकलन का संपादन 2006-2009 तक, 2009 में पर्यावरण पर आधारिक संकलन घऱती कहे पुकार के संपादित किया जिसके लिए उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से पुरस्कृत हुआ, कोलकता से प्रकाशित साहित्य त्रिवेणी के पर्यावरण अंक का 2011 में अतिथि संपादन तथा 2017 से 2022 तक 5 बदरपुर डायरेक्टरी का संपादन, 2023 में महंगी रोटी एकल काब्य संकल आया, जिसका 2023 के विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में लोकार्पण हुआ था।"
उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वे बताते हैं- "वर्ष 2003 में गाजियाबाद में मारिशस के भारत में उच्चायुक्त डॉ. यू.सी द्वारा कैनावेदी द्वारा हिंदी भवन में पर्यावरण संरक्षण के लिए राष्ट्र-गौरव सम्मान, जामिनी अकादमी, पानीपत द्वारा दिल्ली रत्न सम्मान, राष्ट्र भाषा रत्न, साहित्य श्री, साहित्य रत्न,पत्रकार गौरव आदि सहित 100 से ज्यादा पुरस्कार सामाजिक, हिन्दी संरक्षण, पत्रकारिता एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए मिल चुके हैं।"
अपनी के विषय में वे कहते हैं- "सेवा में रहते हुए बहुत कुछ किया है और आगे भी प्रयास जारी रहेगा। सरकार द्वारा सिविल पुरस्कार मिले एक दिन, यही अभिलाषा है। इसके लिए अपना प्रयास जारी है। देखते हैं मंजिल तक कब पहुंचते हैं।"
