सतीश सिंह
जीन संवर्धित खाद्य पदार्थ (जी एम फूड) से जुड़ा हुआ बिल ‘भारतीय जैव प्रौद्यौगिकी नियामक प्राधिकरण विधेयक-2009′ (बीआरएआई) को मानसून सत्र में पेश करने का मन सरकार बना रही है। बवाल इस बिल के पास के होने के बाद भारत में जी एम फूड के उपभोग से होने वाले खतरों को दृष्टिगत करके मचा हुआ है। बीटी बैंगन को लेकर पहले ही काफी हो-हल्ला हो चुका है।
जी एम फूड सबसे पहले विश्‍व के बाजार में सन् 1990 में आया था। सबसे पहले टमाटर के जीन में परिवर्धन किया गया था। इसके पीछे की दलील यह थी कि इससे फसलों की उत्पादकता में इजाफा होगा। साथ ही साथ फसलों की गुणवत्ता भी बढ़ेगी। इस काम को अंजाम दिया था मल्टीनेशनल कंपनी कालजेन ने। जोकि विश्‍वविख्यात मौनसेन्टो कंपनी की सहायक थी।
जी एम फूड के तहत खास करके ट्रांसजेनिक फसल आते हैं, मसलन सोयाबीन, कार्न, कनोला, कॉटन सीड आयॅल इत्यादि। जीन का संवर्धन फसलों के अलावा जानवरों का भी किया जा सकता है। जानवरों पर सबसे पहले इस तरह का परीक्षण सूअरों पर किया गया था। भारत में प्रस्तावित बीआरएआई-2009 विधेयक का मसौदा मूल रुप से फसलों पर केन्द्रित है।
विष्व के कई देश जी एम फूड पर पाबंदी लगा चुके हैं। वस्तुत: अभी तक इसके इस्तेमाल से होनेवाले खतरों से कोई भी देश पूरी तरह से वाकिफ नहीं है। लेकिन जी एम फूड से संबंधित बिल को पास करवाने के लिए हर देश में कवायद की जा रही है।
हमारे देश के वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का मानना है कि जब तक जी एम फूड के प्रयोग से होने वाले नुकसानों से हम अवगत नहीं हो जाते हैं तब तक इस बिल को हमारे देश में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। इसके पीछे उनका यह तर्क है कि बिल पास होने के बाद भारतीय जैव प्रौद्यौगिकी नियामक प्राधिकरण विधेयक-2009 कानून बन जाएगा और कानूनी तौर पर हाथ बंध जाने बाद भारत की जनता नुकसान झेलने के बावजूद भी जी एम फूड के विरोध में ज्यादा हाथ-पैर नहीं हिला पायेगी।
दिलचस्प बात यह है कि हमारे देश में इस मुद्दे पर पर्यावरण मंत्रालय और जैव तकनीक मंत्रालय के बीच जबर्दस्त मतभेद है। इसका मूल कारण इस बिल के अंतगर्त प्रस्तावित मसौदा का विवादास्पद होना है। एकतरफ विज्ञान और प्रौद्यौगिकी मंत्रालय का जैव विभाग जी एम फूड को सुरक्षित मान रहा है तो दूसरी तरफ पर्यावरण और वन मंत्री श्री जयराम रमेश प्रौद्यौगिकी मंत्रालय के जैव विभाग के विचारों से इत्तिफाक नहीं रखते हैं।
विज्ञान और प्रौद्यौगिकी मंत्रालय का मानना है कि भारत में जिस रफ्तार से आबादी बढ़ रही है, निश्वित रुप से कुछ दिनों के बाद सभी के पेट को भरने लायक अनाज पैदा करने में हमारा देश असमर्थ हो जाएगा। इसी समस्या का समाधान है जी एम फूड।
गैर सरकारी संगठन ‘पैरवी’ के पड़तालों से स्पष्ट है कि प्रस्तावित विधेयक में न तो स्वास्थ का ख्याल रखा गया है और न ही जैव सुरक्षा का। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जी एम फूड का अभी तक सफल परीक्षण नहीं किया गया है। भारत में इसका प्रभाव किस तरह का होगा, इस पहलू के बारे में भी विधेयक में कोई जिक्र नहीं है। यदि जी एम फूड के इस्तेमाल से किसी तरह का हादसा होता है या महामारी फैलती है, तो उसके लिए जी एम फूड के बीज निर्माताओं को किसी तरह से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकेगा। इस विधेयक के मसौदे से ऐसा लगता है कि सरकार ने भोपाल गैस कांड से कोई सीख नहीं ली है।
इस विधेयक के अनुसार कोई भी व्यक्ति सूचना के अधिकार के तहत जी एम फूड के बारे में जानकारी हासिल नहीं कर सकता है। क्या सरकार जी एम फूड को राष्‍ट्रीय सुरक्षा के लिए संवेदनशील मानती है? अगर यह मामला इस कदर संवेदनशील है तो फिर इस विधेयक को लागू करने की जल्दी सरकार को क्यों है ?
इस विधेयक में यह भी प्रावधान रखा गया है कि यदि कोई जी एम फूड के बीज या फसल के बारे में उल्टी-सीधी खबरों का प्रचार-प्रसार करते हुए पाया जाता है तो उसके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को और प्रगाढ़ करने की दिशा में उठाया गया यह एक कदम है। कुछ लोगों का कहना है कि इस कदम से भारत और अमेरिका के बीच के कृषि संबधों में और भी मधुरता आएगी। वहीं जी एम फूड के विरोधियों और पर्यावरणविदों का मानना है कि इस तरह के तर्कों को भारत सरकार के द्वारा रखना सिर्फ नाटक का पर्याय है। वस्तुत: सरकार पतली गली से जी एम फूड के बीजों का निर्माण करने वाली कंपनियों को भारत लाना चाहती है।
उल्लेखनीय है कि यह विधेयक पुराने एनबीआरए बिल का संषोधित रुप है। इस पुराने बिल पर जी एम फूड के जानकारों, सामाजिक संगठनों के अलावा देश के 11 राज्यों ने एक सुर अपना विरोध दर्ज करवाया था। इनके संयुक्त विरोध के कारण ही यह बिल संसद में पारित नहीं हो सका था।
केरल सरकार का इस मामले में दृष्टिकोण एकदम साफ है। सरकार में काम कर रहे विषेशज्ञों का मानना है कि भारत को अगले 50 सालों तक जी एम फूड को नहीं स्वीकार करना चाहिए। यह बहुत जरुरी है कि हम जी एम फूड के साइड इफेक्टों से पूरी तरह से अवगत हो जायें।
सरकार भले ही इस बिल को लेकर बहुत उत्साहित है, किंतु हाल ही में उच्च और सर्वोच्च न्यायलय के अवकाश प्राप्त न्यायधीशों के संघ ने भी इस मामले में अपनी गहरी चिंता जताई थी। इन विरोधों की अनदेखी करते हुए अमेरिका के दबाव में आकर सरकार बीआरएआई-2009 विधेयक को संसद में पास करवाना चाहती है। जबकि खुद अमेरिका में ही जी एम फूड के प्रयोग को लेकर एक राय नहीं है। ऐसे में विधेयक में इस तरह के उलटबांसी प्रावधानों का समावेश करना कहीं से भी तार्किक नहीं है।
इस विशय के बरक्स में यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि अमेरिका के मौनसेन्टो कंपनी द्वारा कुछ साल पहले ‘गोल्डन राइस’ के जीन में फेर-बदल करके एक नई किस्म को विकसित किया गया था। इस चावल की किस्म को विकसित करने के लिए बेटा केरोटिन नामक रसायन की मदद ली गई थी। अमेरिकी कृषि वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि इस नई किस्म से विकासशील देशों के बच्चों में अंधेपन और बाल मृत्यु की दर में बहुत हद तक कमी आएगी। पर इसके उपयोग के बाद के परिणाम चौंकाने वाले निकले। यह देखा गया कि इस नई किस्म के चावल को खाने के बाद विकासशील देश के बहुत सारे बच्चे अंधे हो गये।
मौनसेन्टो कंपनी ने ही वियतनाम में जीन संवर्धित ‘ऐजेंट संतरा’ का प्रयोग वहाँ के निवासियों पर किया था, जिसके कारण वहाँ तकरीबन 4 लाख लोगों की मृत्यु हो गई और बड़ी संख्या में लोग विकलांग हो गये । इतना ही नहीं वियतनाम में इसके कारण बहुत दिनों तक बच्चे जन्म से ही विकलांग पैदा होते रहे। ‘ऐजेंट संतरा’ के इस्तेमाल से कैंसर जैसे खतरनाक बीमारी के लक्षण को भी वहाँ के लोगों में देखा गया।
अमेरिका में ही जीन संवर्धित सोयाबीन के खाने से कुछ सब्जेक्टों के लार्ज इन्टेस्टाईन में इन्फेक्षन हो गया था, जिसके कारण उनके लार्ज इन्टेस्टाईन को काट करके उसके शरीर से अलग करना पड़ा। जीन संवर्धित खाद्य पदार्थों का सूअरों पर किये गये परीक्षण का परिणाम भी काफी डरावना रहा है। जीन संवर्धित खाद्य पदार्थों को नियमित तौर पर खाने के बाद सूअरों में बांझपन के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगे।
ब्रिटिस मेडिकल एसोसिएशन ने हाल ही में दिये गए अपने बयान में कहा है कि जी एम फूड से होने वाले खतरे अनंत हैं। इसके प्रयोग से तत्काल खतरा तो है ही, साथ ही भविष्य में भी इसके कारण से समस्याएं आती रहेंगी।
जी एम फूड और जीन सवंर्धित जानवर पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा हैं। इनके प्रसारण से वातावरण में टॉक्सिन और अन्य खतरनाक तत्वों का ईकोसिस्टम में फैलने का खतरा हमेशा बना रहेगा। एक बार जब खतरनाक तत्वों का प्रसारण वायुमंडल में हो जाएगा तो फिर उसको रोकना आसान नहीं होगा।
लगता है विकासशील देशों में रहने वाले इंसानों को विकसित देश वाले प्रयोगशाला में उपयोग किया जाने वाला सब्जेक्ट मान चुके हैं। विडम्बना यह है कि बिना सोचे-विचारे विकासशील देश भी इस बाबत विकसित देशों का साथ दे रहे हैं। सरकार न जाने किस यूटोपिया में जी रही है कि उसकी नजरों में इंसानों की कीमत अब दो कौड़ी की भी नहीं रही है। सच कहा जाए तो विकासशील देशों में इंसानियत और मानवता आज हाशिए पर हैं।


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