अजय शुक्ला 
हमारी एक और बेटी मानसिक रोगियों की हवस का शिकार बन गई। उसके दिल में एक सुनहरे भविष्य का सपना था मगर देश की रक्षा का भार कंधों पर उठाए युवक ने अपने साथियों के साथ उसको असुरक्षित बना दिया। न सिर्फ सामाजिक बल्कि नैतिक दृष्टि से भी। हमारे प्रधानमंत्री से लेकर अन्य जिम्मेदार और सत्ता पर काबिज लोग बयान देते रह गए। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हो या फिर उसके आसपास का इलाका, पहले से ही यह असुरक्षित था। अब तो गांवों की भाई-बहन वाली संस्कृति भी कलंकित हो गई है। हम शर्मसार हैं कि हमारे देश के युवा किस दिशा में जा रहे हैं। अकेली लड़की को देखकर उसको अपनी जिस्मानी भूख मिटाने का साधन मात्र मानने लगते हैं।
हम अचानक यह चर्चा क्यों कर रहे हैं क्योंकि बलात्कार रोजमर्रा की घटना बन गई है। अब इसके खिलाफ मोमबत्तियां लेकर लोग प्रदर्शन नहीं करते। बेटियों को इंसाफ दिलाने और उन्हें बचाने के लिए सड़कों पर नहीं उतर रहे। बता दूं कि उस हरियाणा में जहां एक गांव की बेटी का गांव के बेटे से विवाह नहीं हो सकता क्योंकि उन्हें भाई-बहन माना जाता है, उस राज्य में एक होनहार बेटी के साथ गांव के ही योग्य बेटे ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर सामूहिक बलात्कार किया। यह बेटी सामान्य नहीं थी, बल्कि उसने दसवीं की परीक्षा में सीबीएससी में टॉप किया था। उसे हमारे देश के राष्ट्रपति ने सम्मानित कर खुद को गौरवांवित महसूस किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा से ही ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का शुभारंभ किया था। राज्य में जब बेटियां ही सुरक्षित नहीं रहेंगी तो वह कैसे बचेंगी और कैसे पढ़ेंगी यह सवाल खड़ा हो गया है।
बेटियों के जीवन को तोड़ने वाली मानसिकता से मुक्ति का रास्ता हम क्यों नहीं खोज रहे हैं? सत्ता पर आसीन जिम्मेदार लोग इसका हल क्यों नहीं खोज पा रहे। क्यों नहीं हम इसको लेकर मानसिकता में बदलाव के लिए कुछ कर रहे हैं? इसकी कई वजहें हैं। बड़ा कारण, बलात्कार पीड़िता को तत्काल मदद न मिल पाना है। इसके बाद उसे न्याय के लिए भटकना पड़ता है। ऐसे मामलों के निपटारे में इतना अधिक वक्त लगता है कि अधिकतर मामलों में समझौते का दबाव बन जाता है। कई बार पुलिस असंवेदनशील होती है तो कई बार उस पर अपराधियों को बचाने का राजनीतिक दबाव होता है। देश में हर रोज बलात्कार की कई घटनाएं होती हैं। मगर शोर कुछ मामलों में ही मचता है। तब बलात्कारियों को फांसी पर लटकाने की भी मांग की जाती है।
हमारा मानना है कि फांसी या उम्रकैद कुछ ही इस सामाजिक अपराध का हल नहीं है, बल्कि बलात्कारी को ऐसी सजा मिले कि उसका जीवन उसे खुद बोझ लगने लगे। वह खुद अपराध बोध का शिकार हो जाए जो उसके लिए मौत के समान ही हो। उसे इतना दर्द मिले, जितना पीड़िता ने भुगता है। अगर अपराधी को हम फांसी दे देंगे, तो दर्द उसके परिवार के सदस्यों को होगा, न कि उसे।
हमें अपनी व्यवस्था में यह सुधार करना होगा कि समाज में कई स्तर पर नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया जाए। माता-पिता को भी सांकेतिक सजा मिले, जिससे वह अपने बच्चों में संस्कारों का सृजन करें न कि सिर्फ किताबी पढ़ाई पर जोर दें। हम शुक्रगुजार हैं मिशनरी के विद्यालयों के जो फिलहाल नैतिक शिक्षा के साथ-साथ अपने यहां पढ़ने वाले बच्चों को यौन अपराधों से निपटने और पहचानने का पाठ भी पढ़ाते हैं। अफसोस इस बात का है कि सरकारी स्तर पर तमाम बड़ी-बड़ी बातों को करने के बावजूद हमारे सरकारी स्कूलों की हालत बद से बदतर है। यहां न शिक्षा मिल रही है और न ही संस्कार, जबकि कभी इन्हीं स्कूलों से देश की असंख्य प्रतिभाएं भी निकली हैं और संस्कारित लोग भी। आखिर आज हम यह क्यों नहीं कर सकते? हम क्यों नहीं अपने बच्चों को सिखाते हैं कि किसी की भी बेटी हमारी भी बेटी-बहन, दोस्त है और हमें उनका भी उतना ही सम्मान करना चाहिए, जितना अपने परिवार की बेटियों का करते हैं। हरियाणा से ही सम्मान के नाम पर होने वाली हत्याएं नहीं थम रही हैं। पुलिस एफआईआर दर्ज करने तक से बचती है। सैकड़ों ऐसे उदाहरण आपको मिल जाएंगे, जिसमें पुलिस की लापरवाही सामने होगी।
बलात्कार को रोकने और बेटियों का सम्मान बनाए रखने के लिए हमें हर स्तर पर प्रयास करने की जरूरत है। पुलिस-न्याय व्यवस्था में सुधार के साथ ही सामाजिक जिम्मेदारी तय होना भी बेहद जरूरी है। पुलिस संवेदनशील बने और बेटियों के दर्द को महसूस करे उसके लिए विशेष प्रशिक्षण और संस्कारशाला तैयार करने की जरूरत है। पुलिस थानों में बेटियों की काउंसिलिंग की व्यवस्था होनी चाहिए। इस तरह के मामलों में त्वरित कार्रवाई करने वालों को विशेष सम्मान दिया जाना चाहिए। पीड़ित बेटियों को कलंकित नजर से देखने के बजाय उन्हें बहादुर बेटी के तौर पर देखा जाना चाहिए। बलात्कार पीड़ित बेटी के साथ हर तरह की हमदर्दी दिखाई जानी चाहिए। उन्हें कैसे उस खौफ से बाहर निकाला जाए, इसकी व्यवस्था भी की जानी चाहिए। निभर्या कांड के बाद गठित जस्टिस वर्मा कमेटी ने ही जो सिफारिशें की हैं, अगर वे भी सही अर्थों में लागू हो जाएं, तो काफी हद तक बात बन जाएगी। सरकार ने निभर्या फंड बना दिया, पर उसका पैसा कहां खर्च हो रहा है, यह किसी को पता नहीं है। उस धन से तमाम व्यवस्थाएं की जा सकती हैं।
हम डिजिटल एरा के युवा भारत में जी रहे हैं। मगर यह वह भारत नहीं है, जहां सच और संस्कारों पर जोर दिया जाता था। आज सच की राह पकड़ने वालों का मजाक बनाया जाता है। बेटियों को देवी मानकर पूजा जाता है मगर उसके शरीर को हवसी की तरह भी देखा जाता है। मासूम बच्चियां तक दरिंदगी का शिकार हो रही हैं और वह जीवन भर एक लाश बनकर रह जाती हैं। सरकार के स्तर पर ऐसी बेटियों के सम्मान से जीने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। सरकारी दफ्तर और अफसर मदद को पहुंची ऐसी पीड़ित बेटियों को फिर से शिकार बनाने की ताक में रहते हैं। अत: जरूरत है कि ऐसे अपराध के खिलाफ हम सब एक होकर खड़े हों। यह भी चुनावी सियासी मुद्दा बने जिससे हमारे राजनीतिज्ञ और विधि-व्यवस्था बनाने वाले डरें कि ऐसी घटनाएं हुईं तो उनका भविष्य भी अंधकारमय हो जाएगा। 
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान सम्पादक हैं)


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