रंग अपनी दुनिया के शहंशाह होते हैं
एक धूप-रंग अभी-अभी उग आया है
बारिश के बाद उमस भरी ज़मीन पर
एक इंद्रधनुष तनता आकाश में
और जमीन धूल में सनी मटमैली-सी
यह भी एक रंग है !
रंगों की खुशबू रंगीन होती है
कोई सोंधी- सी सुगंध तैरती है हवाओं में
और हवायें जब गुजरती हैं
इन पहाडि़यों के पार से
तब अलमाती का चिंबुलक याद आता है
चुप और एकांत में उदासी का भी एक रंग है
रंगरेज के हाथों स्पर्श करता रंग...
और रंगते हुए चराचर जगत को
शून्य में विलीन होता रंग भी शहंशाह होता है !
अमरेंद्र मिश्र
